पंचतत्व में खो गये , श्री युत शंकर लाल।
जनहित के संघर्ष को, रखेगा विन्ध्य सभाल।।
कौन ! सुनेगा ! अब यहाँ, दीन हीन की पीर !
विन्ध्य विदाई दे रहा , भर नैनों में नीर!!
लोकतंत्र जन कंठ की , बन कर रहे अवाज।
जनता के दिल में किया लोक रत्न ने राज।।
शोक ! छा गया विन्ध्य में, थमी समय की चाल!
सादर है श्रद्धांजली , हे! जन नायक लाल !!

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