बघेली दोहा ग़ज़ल कविता छंद का संग्रह bagheli doha bagheli kavita bagheli sahitya Bagheli folk literature
सोमवार, 2 नवंबर 2015
कुच्छ न पूछा हाल तिवारी : हंस कहैं जे दारू बांटय ओही न दीन्ह्या बोट। ।
कुच्छ न पूछा हाल तिवारी : हंस कहैं जे दारू बांटय ओही न दीन्ह्या बोट। ।: बिना धनी धोरी का है हेन निरधन अउर गरीब। चाहे ज्याखर राज होय पै बदला नही नसीब। । झउआ भर चल रही योजना पै ओखे कउन लेखा मा। गरीबन का है न...
हंस कहैं जे दारू बांटय ओही न दीन्ह्या बोट। ।
बिना धनी धोरी का है हेन निरधन अउर गरीब।
चाहे ज्याखर राज होय पै बदला नही नसीब। ।
झउआ भर चल रही योजना पै ओखे कउन लेखा मा।
गरीबन का है नाव नही पवित्र गरीबी रेखा मा। ।
चाहे जउन गरीब होय पै सबकै समिस्या एक ही।
सबके आँसू अंतस पीरा केर तपिस्या एक ही। ।
राजनीत सब दिन चटिस ही पूंजी पति के तरबा।
औ गरीब के घर का लाइस अपनेन घर का कोरबा। ।
राजनीत का लखा कपट छल की ही केत्ती सूध।
हमरे घर मा दारू बांटै अपने घर मा दूध। ।
पी पी दूध भै राजनीत य देखा केतनी मोट।
हंस कहैं जे दारू बांटय ओही न दीन्ह्या बोट। ।
हेमराज हंस ----
चाहे ज्याखर राज होय पै बदला नही नसीब। ।
झउआ भर चल रही योजना पै ओखे कउन लेखा मा।
गरीबन का है नाव नही पवित्र गरीबी रेखा मा। ।
चाहे जउन गरीब होय पै सबकै समिस्या एक ही।
सबके आँसू अंतस पीरा केर तपिस्या एक ही। ।
राजनीत सब दिन चटिस ही पूंजी पति के तरबा।
औ गरीब के घर का लाइस अपनेन घर का कोरबा। ।
राजनीत का लखा कपट छल की ही केत्ती सूध।
हमरे घर मा दारू बांटै अपने घर मा दूध। ।
पी पी दूध भै राजनीत य देखा केतनी मोट।
हंस कहैं जे दारू बांटय ओही न दीन्ह्या बोट। ।
हेमराज हंस ----
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
भूंखा टोरबा सोयगा,
भूंखा टोरबा सोयगा, रोटी रोटी कील्ह। महतारी बनबत रहीं, छत मा ठाढे रील।।
-
बघेली कविता आबा उनखे बेलहरा का चूना देखाई थे। जुजबी नहीं दोउ जूना देखाई थे। । चपरासी के भरती मा इंजीनियर ठाढ़ हें देस मा ...
-
नारी के सम्मान से,सम्बत कै सुरुआत। दुनिआ का संदेस है, भारत का नवरात। ।
-
केत्तव पुरखा गुजरिगें, मन मा लये रहस्स। बरिस पांच सै मा मिला ,देखैं का शुभ द्रस्स।। अपने भुंइ मा राम जू , मना रहे हें पर्ब । ...