भूंखा टोरबा सोयगा, रोटी रोटी कील्ह।
महतारी बनबत रहीं, छत मा ठाढे रील।।
बघेली दोहा ग़ज़ल कविता छंद का संग्रह bagheli doha bagheli kavita bagheli sahitya Bagheli folk literature
चक्र कै आत्मा घुस गै कमल के देह मा।
मीठ खूब खाइन ता फंस गें मधुमेह मा।।
राजा मांडा घाई हाल होइहैं हजूर के
कमंडल फेकय लागें मण्डल के नेह मा।।
हेमराज हंस
जनहित के संघर्ष को, रखेगा विन्ध्य सभाल।।
कौन ! सुनेगा ! अब यहाँ, दीन हीन की पीर !
विन्ध्य विदाई दे रहा , भर नैनों में नीर!!
लोकतंत्र जन कंठ की , बन कर रहे अवाज।
जनता के दिल में किया लोक रत्न ने राज।।
शोक ! छा गया विन्ध्य में, थमी समय की चाल!
सादर है श्रद्धांजली , हे! जन नायक लाल !!
तोही चढ़ाइहौ नरिअर रेउरी।
नहीं जानव मैं छन्द ब्याकरन ।
कबि अस मोरे नहीं आचरन। ।
अइगुन करत बीत मोरी अउरी।
हमूं का आसिरबाद दे मइय्या।
बुद्धि बिबेक से लाद दे मइय्या।।
हे हँसबाहिनी ग्यान कै गउरी ।
सब काही तैं दिहे बुद्धि बर।
मोर तोरे चरनन मा है घर। ।
तउअव मोर मती ही बउरी।
कर दे ग्यान अच्छर कै बरखा।
धोबर जाय पाखण्ड औ इरखा।।
हंस के हिदय बना ले चउरी।
हेमराज हंस
भूंखा टोरबा सोयगा, रोटी रोटी कील्ह। महतारी बनबत रहीं, छत मा ठाढे रील।।