जो अर्चन जीवनभर ज़हर पीता रहा,
उसे साँप के ज़हर ने मार दिया
जिसने जीवन भर ज़माने का ज़हर पीया। जिसे परिवार, समाज, अपने-पराये सब डसते रहे, लेकिन ज़िंदा रहा। ऐसा विषपान करने वाला अर्चन पंडित आज साँप के डसने से चला गया। लड़-लड़कर ज़िन्दगी से हर शर्त पूरी कराने वाला मौत से हार गया।
जो भी अर्चन को जानता है, उसे पता ही कि आँसुओं के कई समंदर भीतर समेटे हुए भी वह मिलता तो हँसता हुआ ही मिलता। लिखता तो रुला देता। कार्टून बनाता तो सत्ताओं को मिर्ची लगती। बोलता तो सरस्वती आशीष देतीं। साहित्यिक गोष्ठियों में भी रंग जमाता और सामाजिक गतिविधियों की भी अगुआई करता। चित्रकूट के संतों की सेवा में भी आगे-आगे चलता। चाहता था कि मोटे महंत गुरुकुल चलाएँ और उसमें ग़रीब बच्चे पढ़ें। साँप को क्या मालूम कि उसने कितने सपनों को एक साथ डसा है! कितने ख़्वाबों को अकाल मौत दी है?
जब मैं कॉलेज की पढ़ाई के लिए पहली बार गाँव से रीवा आया था, तब अर्चन ख्यात साहित्यकार नर्मदा नरम के साथ रहता था और स्कूल की पढ़ाई करता था। साहित्यिक गतिविधियों का आयोजक भी होता। दैनिक जागरण के लिए लिखता भी। फिर वर्षों बाद मैं जागरण में संवाददाता बना तब वह मेरे साथ कार्टूनिस्ट था। मेरे उस समय के व्यंग्य आलेखों पर अर्चन के ही कार्टून होते। उसके कार्टूनों की वजह से ही कई बार मेरे व्यंग्य चर्चा का विषय बनते। कई पाठको को आज तक यह भ्रम है कि वे कार्टून भी मैं ही बनाता था। फिर एक दिन मालिकान की हरकत पसंद ना आई और अर्चन ने कहा-“मैं चित्रकूट जाकर सिन्दूर और कुमकुम बेच लूँगा, लेकिन बनिये की नौकरी नहीं करूँगा।” और सचमुच वो चित्रकूट चला गया और कभी लौटकर किसी बड़े शहर में रहने के लिए नहीं गया।
पिछले साल से भोपाल या इंदौर में रहने का बोल रहा था। उसका कहना था कि चित्रकूट मेरे रहने के लिए तो ठीक है, लेकिन बच्चों के पढ़ाने के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं। काश! वह भोपाल या इंदौर आ ही जाता। कम से कम चित्रकूट का साँप उसे खोज ना पाता।
अब मुझे भैया दण्डवत कौन कहेगा? हर वीडियो की समीक्षा कौन करेगा? चित्रकूट आने का न्योता कौन देगा? बहू-बच्चों को कौन देखेगा?
जब से सूचना मिली है अर्चन का चेहरा आँखों के आगे झूल रहा है। भगवान कामातानाथ उसकी रक्षा तो नहीं कर पाए, कम से कम उसे अपने श्रीचरणों में स्थान दें। सद्गति दें। तुम्हें कैसे भूलेंगे अनुज?
@ओम द्विवेदी
कम देखें
मित्रों
साहित्य जगत को अपूरणीय क्षति हुई
विंध्य के चर्चित रचनाकर्मी "अर्चन पंडित" अब हम सबके बीच नहीं रहे।कल 28 सितंबर को सर्पदंश से उनकी असमय मृत्यु हो गई। अर्चन पंडित देश के सुप्रसिद्ध साहित्यकार चित्रकार प्रोफेसर "प्रणय" के इकलौते बेटे थे। वो एक ज़िंदा दिल इंसान थे जिस किसी के पास पांच मिनट भी बैठ जाते थे एक अलग छाप छोड़ जाते थे।हम सबने एक अच्छा रचना धर्मी के साथ साथ अच्छा कवि चिंतक प्रखर वक्ता मानवीय मूल्यों का संवाहक उत्कृष्ट मंच संचालक भाषाई दक्षता के चित्रकार कार्टूनिस्ट खो दिया है अभी तीन दिन पूर्व शाम को मेरी उनसे लगभग एक घंटा बातचीत हुई। मेरे दुख के क्षणों में वे हमेशा ही मेरे मनोबल में वृद्धि करते थे मैं उनके असामयिक निधन से स्तब्ध हूं।
ईश्वर उनके पिता और परिवार को यह गहन दुख सहन करने की शक्ति प्रदान करे। शत् शत् नमन विनम्र श्रद्धांजलि
बहुत याद आओगे अर्चन : शत शत नमन
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तुम्हे भुला नहीं पाऊंगा अर्चन। तुम्हारा असमय में चले जाना बहुत ही दुखद है।रह - रह कर, याद आता है वह दिन जब तुम्हारे पापा डाँ. प्रणय ने तुम्हे मुझे सौपा था। उस समय डाँ. प्रणय
लालगांव में प्रध्यापक थे।मै मार्तंड शासकीय बहुउद्देशीय उ. मा. विद्यालय रीवा क्र. 3 में पदस्थ था। तुम मेरे साथ उर्रहट में रहकर नवमी कक्षा में मार्तण्ड क्रं 3 में पढते थे।एक साल में ही रीवा में प्रसिद्ध हो गये थे।तत्कालीन कलेक्टर डाँ. अमर सिंह के हाथों प्रदर्श निर्माण में तुम्हे प्रथम स्थान मिला था।
साहित्य, कला, रेखांकन तो तुम्हे विरासत में मिला था। कौन जानता था कि स्तरीय पत्रकार, चित्रकार, कार्टूनिस्ट, लेखक, गीतकार अल्पायु में ही इस धराधाम को छोड देगा।
----------- शत शत नमन।
भगवान अच्छे लोगों के साथ ही ऐसा क्यों करते हैं…? 

आदरणीय अर्चन दादा के दुखद निधन का समाचार प्राप्त हुआ। हृदय अत्यंत द्रवित है और मन इस अकस्मात् वियोग को स्वीकार नहीं कर पा रहा है।

दादा से वैसे तो मेरी मुलाकातें बहुत कम समय की रही हैं, लेकिन उन अल्प मुलाकातों में भी उनका स्नेह और अपनापन सदैव स्मरणीय रहेगा। चित्रकूट जनपद में मेरे प्रथम कवि सम्मेलन की शुरुआत भी आपके ही स्नेह और प्रोत्साहन से हुई थी। इसके बाद जब भी आसपास कहीं मेरा कार्यक्रम होता, आप बिना बताए चुपचाप मुझे सुनने आ जाते थे। आपका वह स्नेह, वह अपनापन और साहित्य के प्रति आपका उत्साह सदैव मेरी स्मृतियों में जीवित रहेगा।
दादा, भगवान को ऐसा नहीं करना था…
अभी तो बहुत कुछ कहना-सुनना बाकी था।
आपका यूँ अचानक चले जाना मन को भीतर तक व्यथित कर गया है।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें एवं शोकाकुल परिजनों तथा हम सभी को यह अपार दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करें।
भावपूर्ण श्रद्धांजलि।
हम चाहते रहे कि कोई ढंग की बात हो
वह पूछते रहे कि कहो कौन ज़ात हो।
होने को घर-घराने के बहुतेरे हैं खिलाफ़
पर यह भी चाहते हैं यही ज़ात-पात हो।
यह क्या कि हाथ खींच क बैठे हैं यार लोग
कुछ चोट-वोट चलती रहे, घात-वात हो
कलम, वाणी के जिंदादिल कलाकार अर्चन नहीं रहे…
मानिकपुर क्षेत्र के बगदरी गांव की माटी में जन्मे अर्चन भाई का असमय निधन कला, साहित्य और संवेदना की दुनिया के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव के दौरान उनकी अद्भुत प्रतिभा से पहली बार परिचय हुआ था। उनकी रचनात्मकता से निकली लोकभाषा की पंक्तियां—
“दादू है दबंग है, अभी तो वोट मांगते हैं, बाद में चरसा उचेलेंगे…”
जैसी लोकोक्तियां आज भी उनकी मौलिक कल्पनाशीलता और सहज हास्य-बोध की याद दिलाती हैं।
बाद के वर्षों में अर्चन भाई को करीब से जानने का अवसर मिला तो उनके व्यक्तित्व के अनेक रंग सामने आए—
लेखक, कवि, चित्रकार, मंच प्रस्तोता और सबसे बढ़कर एक बेहद संवेदनशील एवं भावुक इंसान।
हाल ही में आई भीषण बाढ़ में प्रमोदवन स्थित उनका निवास पूरी तरह जलमग्न हो गया था। परिस्थितियों के चलते उन्हें रानीपुर भट्ट स्थित अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान में आश्रय लेना पड़ा।
सोमवार की देर रात लगभग दो बजे कमरे में सर्प के काटने की दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई। संस्थान के निदेशक राष्ट्रदीप जी एवं सहयोगी उन्हें तत्काल जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। चिकित्सकों के अथक प्रयास और उपचार के बावजूद अर्चन भाई को बचाया नहीं जा सका।
एक जिंदादिल कलाकार, शब्दों का शिल्पी और संवेदनाओं से भरा मन आज हमारे बीच नहीं है।
लेकिन उनकी कलम की धार, रंगों की भाषा, मंच की आवाज और सहज मुस्कान उन्हें लंबे समय तक हमारे बीच जीवित रखेगी।
बुन्देली दीवारी लोकनृत्य शोधबाँदाथान बाँदा की ओर से अर्चन भाई को विनम्र एवं अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और शोकाकुल परिवार को इस असहनीय पीड़ा को सहने की शक्ति प्रदान करें। ॐ शान्ति ॐ शान्ति ॐ शान्ति 
तर्पण
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खूब जिए
बड़कौना !
जीवनभर
मनमानी कर
बीबी बच्चों तक से
बेईमानी कर
सारी मर्यादाएं
तोड़ताड़
अपने, सपने सब
फोड़फाड़
चौतरफा, बस
ज़हर ही घोले
चुपकर सबको
तुम ही तुम बोले
कितने निर्मम
कितने झुट्ठे
हर सच के
होंठ सिए
बड़कौना !
रिश्ता कहीं
पवित्र न था
थे गुणवंत,
चरित्र न था
राग तुम्ही थे
आग तुम्ही थे
उज्ज्वल कुल के
दाग़ तुम्ही थे।
इसे फँसाकर
उसे लड़ाकर
घर-बाहर
नंगई बढ़ाकर
यारी, गद्दारी
अजलत सारी
खूब किए
बड़कौना !
मुर्दा घर,
मुर्दा समाज में
खूब जिए
बड़कौना !
-प्रियंका पाण्डेय
भोपाल, म०प्र०
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