बुधवार, 13 मार्च 2024

बसंत के दोहे

 अपना हयन गुलाब अस, हम कनेर के फूल। 

कोउ दिहिस मछेह के,  छतना  काही  गूल। । 


 अस कागद के फूल मा, गमकैं लाग बसंत।

जस पियरी पहिरे छलय, पंचबटी का संत।।


हबा  बसंती  चूम गै,  जब  गुलाब  के ओंठ। 

ता भमरा का झार भै, जिव का रहा कचोट।।


जब फागुन दसकत किहिस,गड़ी गाँव  मा डाँड़।

चिनी केर रंग बदलिगा ,   लागै  जइसा    खांड।। 


जिधना से फागुन लगा, बागै मन बउरात ।

दिन गउरइंया अस लगै, औ जिंदबा कस रात।।


भमरा तक सूंघय लगा अब चम्पा का फूल।

अइसा मउसम मा भला कासे होय न भूल।।


पुष्पवाटिकै मा मिली, सहज प्रीत का नेम।

सुरपंखा हेरत फिरय, पंचबटी मा प्रेम।।


फगुनहटी बइहर चली ,गंध थथोलत फूल।

भमरा पुन पुन खुइ करै, तितली पीठे गूल।।


सनकिन सनकी बात भै, आगू पाछू देख।

कब आंसू मा भींज गै लखिस न काजर रेख ।।


 बड़ी   ललत्ती   लग  रही,  अमराई   कै  भूंख। 

असमव ओखे डाल मा, नहीं कोयलिया कूंक।।

महुआ अस महकैं लगा, जब मन मा मधुमास।
ता आँखिन के नेत का, भा खंडित संन्यास।।

बीस जघा करजा किहिन, ता होइ सका प्रबंध।

अपना का आबा नहीं, नेउता मा आनंद।।

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