कागा से कोयल कहिस, दिहा काहे खुरखुन्द।
तोहरव प्रिय बोली लगी, बन जा काग भुसुंड।।
जब मतलब पूछय लगें, रामराज्ज का मित्र।
हम निकार के धइ दिहन,अबधपुरी का चित्र।।
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भूंखा टोरबा सोयगा, रोटी रोटी कील्ह। महतारी बनबत रहीं, छत मा ठाढे रील।।
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