सिरि बानी बन्दना
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हे मातु शारदे संबल दे तै निरबल छिनीमनंगा का।
मोरे देस कै शान बढै औ बाढै मान तिरंगा का॥
दिन दिन दूना होय देस मां लोकतंत्र मजबूत।
घर घर विदुषी बिटिया हों औ,लड़िका होंय सपूत॥
विद्वानन कै सभा सजै औ पतन होय हेन नंगा का।
मोरे देस कै शान बढै औ बाढै मान तिरंगा का॥
बसुधैव कुटुंम्बं' केर भामना बसी रहै सब के मन मां।
औ परबस्ती कै लउलितिया, रहै कामना जन जन मां ॥
देस प्रेम कै जोत जलै, कहूं मिलै ठउर न दंगा॥
मोरे देस.........................
खेलै पढै बढैं बिद्यार्थी, रोजी मिलै जमानन का।
खेत का खाद बीज औ पानी , सुबिधा मिलै किसानन का ॥
रामेश्वरं मां चढत रहै जल, गंगोतरी के गंगा का।
मोरे देस कै ......................
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वाणी वंदना
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वर दे वीणापाणि हंसवाहिनी वागीश माँ ,मेरे देश को तु सुख शान्ति समृद्धि दे।
राग द्वेष के कलेष लेश मात्र भी न रहें ,जन जन में जान्हवी सी शुचि धार बुद्धि दे। ।
सब में हो सर्व धर्म सदभाव भावना ,सत्य शौर्य धैर्य बल विवेक की तू वृद्धि दे।
दे दे शारदे अम्ब अविलम्ब अवलंब,भारत में भर्ती माँ ऋत ऋद्धि सिद्धि दे। ।।
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मैहर धाम
मइहर है जहां बिद्या कै देवी
बिराजी मा शारद शक्ति भवानी।
पहिलय पूजा करय नित आल्हा
ता देवी के बर से बना बरदानी।।
मइहर है जहाँ लिलजी के तट
गोला मठ मा हैं औघड़ दानी।
मइहर है जहाँ संगम है सुर
सरगम कै झंकार सुहानी। ।
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मइहर है जहाँ भक्ति क रेला है
श्रद्धा औ बिस्वास का मेला।
जग जननी के दरशन खातिर
धाबत जग नव रातरि बेला। ।
काहु के हाथ मा सेंदुर फूटा है
काहू के हाथे मा नरियर भेला।
कोउ चढ़ाबत मेबा मिठाई
कोउ चढ़ाबत फूल औ केला। ।
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मइहर है जहाँ रामसखा जू का
आश्रम गुरुकुल बिद्याधानी।
बेद बिद्यालय मा वेद ऋचा पढ़ि
बालक ग्यानी बनैं बिग्यानी।।
ओइला मा मन केर कोइला हो उज्जर
मन बच कर्म लगाबै जे प्रानी।
हंस पुनीत या मइहर धाम का
शत शत बंदन चंदन पानी। ।
@हेमराज हंस भेड़ा मैहर
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बिटिया
ठुम्मुक ठुम्मुक जाथी इस्कूलै ड्रेस पहिर के बइया रे।
टाँगे बस्ता पोथी पत्रा बिटिया बनी पढ़इया रे। ।
खेलै चन्दा, लगड़ी, गिप्पी, गोटी, पुत्ता -पुत्ती ।
छीन भर मा मनुहाय जाय औ छिन भर माही कुट्टी। ।
बिट्टी लल्ला का खिसबाबै ''लोल बटाइया रे''। ।
ठउर लगाबै अउजै परसै करै चार ठे त्वारा।
कहू चढ़ी बब्बा के कइयां कहु अम्मा के क्वारा। ।
जब रिसाय ता पापा दाकै पकड़ झोठइया रे।
बिन बिटिया के अंगना अनमन घर बे सुर कै बंसी।
बिटिया दुइ दुइ कुल कै होतीं मरजादा बड़मंसी। ।
हमरे टोरिअन काही खाये जा थै दइया रे।
भले नही भइ भये मा स्वाहर पै न माना अभारु।
लड़िका से ही ज्यादा बिटिया ममता भरी मयारू। ।
पढ़ी लिखी ता बन जई टोरिया खुदै सहय्याँ रे।
कन्यन कै होइ रही ही हत्या बिगड़ि रहा अनुपात।
यहै पतन जो रही 'हंस ' ता कइसा सजी बरात। ।
मुरही कोख से टेर लगाबै बचा ले मइया रे। ।
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चली करैं मतदान
चला भैय्या मतदान केन्द्र हो चली करैं मतदान।
अपने बोट दिहे ते होई लोकतंत्र बलमान। ।
हम अब्बल लोकतंत्र दुनिया के मानि रहा संसार।
जनता का जनता के खातिर चला चुनी सरकार। ।
बोटहाई के दिना करी मतदान केन्द्र प्रस्थान।
चला भैय्या मतदान केन्द्र --------------------------
कोऊ बांकी बची न अपना डारी सब जन बोट।
अपने मन के प्रत्याशी का खुदै चढ़ाई रोट। ।
बिन दबाव लालच के भाई मन का चुनी निशान।
चला भैय्या मतदान केन्द्र -------------------------------
चला करी संकल्प बंधी सब एकय साहुत सूत।
सबसे जादा बोट डराउब अपने अपने बूथ। ।
गांव गांव औ नगर नगर का बोलय हिन्दुस्तान।
चला भैय्या मतदान केन्द्र------------------------------------
हे मतदाता भाई बहिनी दाऊ काकी कक्का।
अरथुत के मतदान करी अपना अरगासी सबका।
अपना के मतदान मा धड़कै लोकतंत्र कै जान।
चला भैय्या मतदान केन्द्र हो चली करैं मतदान। ।
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नकटी कहां से आय गै
तुलसी के बगिया मा नकटी कहां से आय गै।
यतना पचामै कै शक्ती कहाँ से आय गै । ।
जे काल्ह तक धरम का अफीम बताउत रहें
वा कुपोषित बिचार मा भक्ती कहां से आय गै। ।
उइ कहा थें काबू मा आतंकबाद है
फउजी कै हमरे गांव मा तख्ती कहाँ से आय गै। ।
दुनिया मा पंचशील का खुब राग अलापा गा
ता खून सनी खबर कै रक्ती कहां से आय गै। ।
असमय ता दसमी केर वा परिच्छा दिहिसी
हाथे मा लगनपत्री लये अकती कहां से आय गै। ।
कबहुं आर्य द्रबिन कबौ मूल निबासी
समाज टोरय बाली बिभक्ती कहां से आय गै। ।
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अपना के हींसा मा
अब ता सगले पुन्न धरें अपना के हींसा मा।
तउ लजाते हयन देख मुँह आपन सीसा मा। ।
को फुर कहै बताबै भाई देस के जनता से
जबकी हेन उइ मगन हेमै सत्ता के चालीसा मा। ।
उइ पाखण्डी देस के सूरज काही जुगनू लिख दीन्हिन
लबरी पोदी बाला वा इतिहास है हमरे हीसा मा। ।
सिये सिये अस ओंठ हे भइय्या अमरित परब आजादी के
लागै जइसा आंखर- आंखर बंद हो बपुरे मीसा मा। ।
सागर कै अउकात नहीं पै नरबा खुब अभुआय लगे
हंस कहा थें उइ अगस्त का बंद है हमरे खीसा मा। ।
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आबा बिकास का गड़बा देखाई थे
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आबा बिकास का गड़बा देखाई थे।
वमै डबरा योजना का पड़बा दिखाई थे।।
जउन किसानन कै आमदानी भै दूगुन
ओखे मड़इया के खड़बा देखाई थे। ।
जउन खाद बीज खितिर गहन धरा है
वा किसानिन कै झुमकी औ छड़बा देखाई थे। ।
मध्ध्यान भोजन का सेबाद बड़ा गुरतुर है
अपना का इस्कूल के भड़बा हम देखाई थे। ।
भमरी जब परिगय ता वा बजगीर साथ भागि गय
हम वा उढ़री राजनीत का मड़बा देखाई थे। ।
हंस के बगिया मा लिपटिस कै राज ही
मुरझान परा आमा का हम कड़बा देखाई थे। ।
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साहित्त फुर कहा थै
साहित्त फुर कहा थै लबरी नही कहै।
अपना के सत्ता अस जबरी नही कहै। ।
साहित्त के नस मा दुष्यंत केर मस है ,
साहित्त खउटही का कबरी नहीं कहै। ।
''राम'' के दरबार तक वाखर धाक ही ,
पै कबहू अपने मुंह से ''शबरी''नही कहै। ।
उई घायल से पूंछा थें कि कइसा लगा थै
अस्पताल पहुचामै का खबरी नहीं कहै। ।
रूपियन के निता कबहू कविता नही लिखै
हंस काही कोउ दुइ नम्बरी नहीं कहै। ।
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शहीदन कै वंदना
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धन्न धन्न सौ बेर धन्न य देस कै पावन माटी।
हमरे पुरखन का प्रताप औ भारत कै परिपाटी। ।
कहय लाग भारत माता धन्न बहिनी डोर कलाई का।
जे सीमा मा संगीन लये दइन जीवन देस भलाई का। ।
धन्न कोख महतारी कै जे पूत दान दइन मूठी मा।
मातृभूमि के देस प्रेम का दूध पिआइन घूंटी मा। ।
धन्न धन्न वा छाती का जेहि एकव है संताप नही।
बलिदान पूत भा देस निता धन्न धन्न वा बाप कही। ।
धन्न धन्न वा येगुर काहीं वा सेंदुर कै मांग धन्न।
ज्याखर भा अहिवात अमर वा नारी केर सोहाग धन्न। ।
उई भाईन कै बांह धन्न मारिन सुबाहु मरीची अस।
बइरी वृत्तासुर मरै का जे बन गें वज्र दधीची अस। ।
औ अपने अपने रक्तन से वन्दे मातरम उरेह दइन.।
जब भारत माता मागिस ता उई हँसत निछावर देह दइन। ।
बोली हर हर महादेव कै बोल ऊचें सरहद्दी मा।
औ बैरिन का मार भगाइन खेलै खेल कबड्डी मा। ।
धन्न उई अमर जबानन का जेहिं कप्फन मिला तिरंगा का।
जब राख फूल पहुंची प्रयाग ता झूम उचा मन गंगा का। ।
ताल भैरवी देश राग तब गूंजी घाटी घाटी।
धन्न धन्न सौ बेर धन्न या देस कै पावन माटी। ।
गरजै लगे सफ़ेद शेर औ बांधव गढ़ के हिरना।
फूली नही समतीं बीहर औ केवटी के झिरना। ।
बीर सपूतन के उरांव मा डुबी गइया बछिया।
बीर पदमधर के बलिदानव का खुब सुमिरै बिछिया। ।
बीर विंध्य कै सुनै कहानी नानी मुन्ना मुन्नी।
गद्गद होइ गें चित्रकूट औ धार कुड़ी पयसुन्नी।।
अमरकंटक मा बिह्वल रेवा सुन के अमर कहानी।
विंध पूत सीमा मा जाके बने अमर बलिदानी। ।
कलकल करत चली पछिम का दुश्मन कई दहाड़ी।
सीना तानै'' नरो'' ''पनपथा'' औ" कैमोर' पहाड़ी। ।
तबहिंन हिन्द महा सागर मा बड़ बडबानाल धंधका।
दुश्मन के भें ढ़ील सटन्ना हिन्दू कुश तक दंदका। ।
गोपद बनास टठिया साजै औ सोन करै पूजा पाती।
औ रेवा खुद धन्न होइ गई कइ के उनखर सँझबाती। ।
हे !उनखे तरबा का धूधुर हमरे लिलार का चन्दन बन।
ओ कवि !तहू दे खून कुछू तबहिन होइ उनखर वंदन। ।
देस भक्ति जनसेवा बाली ही जिनखर परिपाटी।
धन्न धन्न सौ बेर धन्न या देश कै पावन माटी। ।
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अटलबिहारी
भारत माता भय दुखियारी खो के अटलबिहारी का।
जुग गाई उनखर गुन गाँथा थाती धरे चिन्हारी का। ।
जब जब नेतन कै बात चली ता भारत माता यहै कही
देखा अपने अंतस का पून देखा अटलबिहारी का। ।
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**हे जुग नायक अटलबिहारी **
हे जुग नायक अटलबिहारी।
अपना का य देस आभारी। ।
हिरदय राज किहिन जन जन के।
रहे कबीर अस सबके मन के। ।
को है यतर बड़ा बेउहारी।
हे जुग --------------------
भारत के अनमोल रतन उइ।
अपने आप मा एक बतन उइ। ।
सबके मंगल अउ उपकारी।
हे जुग ----------------------
लोकतंत्र के अटल हिमालय।
साहुत के इस्लोक शिवालय। ।
भारत रतन हे अटलबिहारी।
हे जुग ---------------------
लोकतंत्र के उइ चरित्र अस।
सबके हितुआ रहे मिंत्र अस। ।
तानाशाही का बनबारी।
हे जुग नायक अटलबिहारी। ।
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आपन बोली
महतारी अस लगै मयारू घूंटी साथ पिआई।
आपन बोली बानी लागय मानस कै चौपाई।।
भांसा केर जबर है रकबा बहुत बड़ा संसार।
पै अपने बोली बानी कै अंतस तक ही मार।।
काने माही झनक परै जब बोली कै कबिताई।
आपन बोली बानी लागय मानस कै चौपाई।।
समझैं आपन बोली बानी बोकरी भंइसी गइया।
नीक लगै जब लोक गीत अस गाबै कहूं गबइया।।
अपने बोली मा कोल दहकी लोरी टिप्पा राई।
आपन बोली बानी लागय मानस कै चौपाई।।
महकै अपने बोली माही गांव गली कै माटी।
आपन बोली महतारी के हांथ कै परसी टाठी।।
अपने बोली मा गोहरामै घर मा बब्बा दाई।
आपन बोली बानी लागय मानस कै चौपाई।।
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बिटिआ कै बसकट (जन्मदिन)
बड़े सकारे बिटिआ बोली बड़े उराव भरे।
पापाऽ आजु मोर बसकट ही हरबी अया घरे।।
हम न कहब कि तुम लइ आन्या हमी मिठाई केक।
घर मा सब जन बड़े प्रेम से खाब अंगाकर सेक।।
झोरा माही दस रुपया कै लइया लया धरे।
बचै केराया से जो पइसा लीन्हया एक कलम।
ज्यमा उरेहब अच्छर अच्छर सीखब लिखय करम।।
पढ़ब लिखब ता देखि लिहा पुन दिन अपनिव बहुरे।।
मोहि न चाही नये नये ओन्हा येतु करया बंधेज।
रक्छा होय मोरे बचपन कै औ पढि सकउ कलेज।।
सुसुकि सुसुकि के रोबैं लागी दोऊ तरइना भरे।
पापा आज मोर बसकट ही हरबी अया घरे।।
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गरीब केर ठंडी
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टोरिया कहा है
बारजा बचा है ओरिआ कहाँ ही।
पिल्वांदा के दूध कै खोरिआ कहाँ ही।।
राशन कार्ड हलाबत तिजिया चली गै
कोटा बाली चीनी कै बोरिआ कहाँ ही।।
आजादी के अश्व मेध कै भभूत बची ही
गांधी के लोकतंत्र कै अजोरिआ कहाँ ही।।
वा प्रदूषण कै पनही पहिरे मुड़हर मा चला गा
घर गाँव के अदब कै ओसरिआ कहाँ ही।।
नोकरी लगबामैं का कहि के लइ गया तै
वा गरीब कै बड़मंसी टोरिआ कहाँ ही।।
सार अबाही खूंटा ग्यरमा औ अम्मा का पहिलय सुर
कामधेनु कै पामर वा कलोरिआ कहाँ ही।।
घर के सुख संच कै जे जपत रहें माला
वा पिता जी कै लाल लाल झोरिआ कहाँ ही।।
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मजूर [बघेली कविता ]
हम मजूर बनिहार बरेदी आह्यन लेबर लगुआ।
करी मशक्क़त तनमन से हम गरमी जाड़े कदुआ। ।
माघ पूस कै ठाही हो चह नव तपा कै दुपहरिया।
सामान भादौ के कादौ मा बे पनही बे छतरिया। ।
मिलब कहू हम पाथर फोरत करत कहू हरवाही।
खटत खेत खरिहान खान म काहू ताके पाही। ।
हम कहू का काम निकारी औ काहू के बंधुआ।
''कर्म प्रधान विश्व करी राखा ''कहि गें तुलसी दास।
कर्म देव के हम विश्कर्मा देस मा पाई त्रास। ।
शोषक चुसि रहे हे हमही अमर बेल की नाइ।
अउर चुहुकि के करै फराके गन्ना चीहुल घाई। ।
दुधिआ दातन मा बुढ़ाय गा हमरे गाँव का गगुआ।
हम पसीना से देस का सीच्यन हमरै किस्मत सूखी।
देस कोष मा भरयन लक्ष्मी घर कै लक्ष्मी भूखी। ।
घूंट घूँट अपमान पिअत हम गढ़ी प्रगति कै सीढ़ी।
मन तक गहन है बेउहर के हेन रिन मा चढ़ गयीं पीढ़ी। ।
फूंका परा है हमरे घर मा तउ हम गाई फगुआ। ।
हम मजूर ------------
हमिन बनायन लालकिला खजुराहो ताज महल।
हमिन बनायन दमदम पालम सुघर जिहाज महल। ।
हमहिंन बाँध्यन नदिया नरबा तलबा अउर तलइया।
हमिन बनायन धमनी चिमनी लखनऊ भूल भुलइया। ।
हम सिसकत सीत ओसरिया माहीं धइ के सोई तरुआ।
कहै क त गंगा जल अस है पबरित हमार पसीना।
तउ ''कर्मनाशा ''अस तन है पीरा पाले सीना।।
बड़े लगन से देश बनाई मेहनत करी आकूत।
मेहनत आय गीता रामायन हम हन तउ अछूत। ।
छुआछूत का हइया दाबे देस समाज का टेटुआ।
हम मजूर ---
बिन खाये के गंडाही का है छप्पन जेउनार।
कनबहिरे भोपाल औ दिल्ली को अब सुनै गोहर। ।
जब जब माग्यन उचित मजूरी तब तब निथरा खून।
पूंजी पति के पॉय तरी है देस का श्रम कानून। ।
न्याय मांगे मा काल्ह मारे गें दत्ता नियोगी रघुआ।
हम मजूर ---------------------------------
भले ठेस ठेठा कराह से हाँकी आपन अटाला।
पै हम करब न घात देस मा भ्रष्टाचार घोटाला। ।
जे खून पसीना अउंट के माड़ै रोटी केर पिसान।
हमी उराव है अइसन माई बाप कै हम संतान। ।
हमरे कुल मा पइदा नहि होंय डाकू गुंडा ठगुआ।
हम मजूर बनिहार बरेदी आह्यन लेबर लगुआ। ।
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फलनिया
जबसे तोहका दिख्यन फलनिया भाजी खोटत खेत मा।
तब से धकपक करय करेजबा औ मन नहि आय चेत मा।।
महकैं लाग मेड़ पगडंडी गुलमेंहदी औ रेउजा।
चंचल मन का धौं काहे य हिदय लेय उपरउझा।।
रामौ सत्त कही हम तोहसे खोट न कउनौ नेत मा।
पहिल दउगरा के भुंइ घांई गमकै उनखर देह।
उपरंगी उंई पीसैं दांत पै भितर गुल्ल है नेह।।
मारे लाज के लाल गाल जस पहिलय चुम्मा लेत मा।
वा गसान कै मेड़ फलनिया लागै बड़ी उरायल।
बइर खात मा जहा गिरी तै छमछम बाजत पायल।।
सामर मुंहिआ अइसा लागै जइसा धान गलेथ मा।
बोली लगय तोहार फलनिया लोकगीत अस मीठ।
सहजभोर छोहगर य रूप मा लग न जाय कहुं डींठ।।
बड़ी पिआर लगा तू हमका हमरै ओरहन देत मा।
जब से तोहका दिख्यन फलनिया भाजी खोटत खेत मा।।
अबहूं नही व बिसरै घटबा दउरी धोमन चाउर।।
अउ मूडे़ का जूड़ा लागै जइसा खेत मा छाहुर।।।
घटै बढ़ै धड़कन का रकबा तापमान जस रेत मा।
जब से तोहका दिख्यन फलनिया भाजी खोटत खेत मा।।
लगै गाल का तिला फलनिया जइसा होय डिठउरा।
पै चम्पा के फूल के नियरे हिरकै कबौं न भउरा।।
काहू के नैनन का दोहपन लग न जाय कहुं सेंत मा।
जब से तोहका दिख्यन फलनिया भाजी खोटत खेत मा।।
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ओही दिहा न वोट
बिना धनीधोरी का है हेन निरधन अउर गरीब।
चाहे ज्याखर राज होय पै बदला नही नसीब।।
झउआ भर चलि रहीं योजना पै ओखे कउन लेखा मा।
गरीबन का है नाव नही पबित्र गरीबी रेखा मा।।
चह जउन जात हो गरीब पै सब कै समिस्या एक ही।
सबके आँसू अंतस पीरा केर तपिस्या एक ही।।
राजनीत सब दिन चाटिस ही पूंजीपति के तरबा।
औ गरीब के घर का लाइस अपनेन घर का क्वरबा।।
राजनीत का लखा कपट छल की ही केत्ती सूध।
हमरे घर मा दारू बांट्य अपने घर मा दूध।।
पी पी दूध भै राजनीत य द्याखा केत्ती मोट।
हंस कहैं जे दारू बांट्य ओही दिहा न बोट।।
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जब से य मन मोहित होइगा
जब से य मन मोहित होइगा, तोहरे निरछल रूप मां।
एकव अंतर नही जनातै, चलनी मां औ सूप मां॥
रात रात भर लिहन कराउंटा, नीद न आई आंखिन का।
औ मन बाउर बइकल बागै, ओ ! गोरी तोरे उूब मां॥
सनकिन सनकी बातैं होइ गईं, लखे न पाइस पलकौ तक।
मन निकार के उंइ धइ दीन्हिन हमरे दोनिया दूब मां॥
ओंठ पिआसे से न कउनौं,=एक आंखर पनघट बोलिस।
पता नही धौं केतू वाठर, निकराथें नलकूप मां॥
सातक्षात् तुम पे्रम कै मुरत, होइ के निठमोहिल न बना।
द्याखा केतू करूना होथी, ईंटा के स्तूप' मां॥
जब से फुरा जमोखी होइगै, तन औ मन के ओरहन कै,
तब से फलाने महकै लागें, जइसा मंदिर धूप मां॥
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🙅🙅तै लगते इन्दौर फलनिया 💁💁
हम सामर तैं गोर फलनिया।
बड़ी मयारू मोर फलनिया। ।
जीवन के ताना -बाना कै ।
तैं सूजी हम डोर फलनिया। ।
हम रतिया भादव महिना कै ।
तैं फागुन कै भोर फलनिया। ।
रिम झिम रिम झिम प्रेम के रित मा ।
तैं मेघा हम मोर फलनिया। ।
हम हन बिंध अस ठगे ठगे औ।
तैं लगते इन्दौर फलनिया। ।
हिरदय भा कोहबर अस बाती ।
जब हंस से भा गठजोर फलनिया। ।
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धांधे जइहा
काल्ह तुहूं ता धांधे जइहा।
हीठत जइहा कांधे अइहा।।
ब्रिंदाबन मा रहय का है ता
तुमहूं राधे -- राधे गइहा । ।
भ्रसटन मा हम बिस्व गुरु हन
कबहुं ता आराधे जइहा। ।
छापा परा ता निकली गड्डी
अब ता भइलो बांधे जइहा। ।
पूर सभा गंधाय लाग ही
आखिर कब तक पादे जइहै। ।
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दरबारन मा चरचा है
दरबारन मा चरचा ही कम्प्यूटर इंटरनेट के ।
खरिहानन मा मरै किसनमा फंदा गरे लपेट के। ।
केत्तव निकहा बीज होय पै पनपै नहीं छह्याला मा।
उनही दइ द्या ठयाव सुरिज का दउरैं न सरसेट के। ।
करब टंटपाली अउ टोरइली कब का उइ ता भुलि चुकें
बपुरे ध्रुब प्रहलाद हें दूरी पोथी अउर सलेट के। ।
अइसा घिनही आँधी आई बिथरि गा सब भाई चारा।
पुरखा जेही बड़े जतन से सउपिन रहा सहेज के। ।
मंदिर मसजिद से समाज के मिल्लस कै न आस करा
धरम के ठेकेदारन का ई आही साधन पेट के। ।
प्रेमचंद के होरी का उइ उगरी धरे बताऊथें
द्याखा भइलो ताज महल औ चित्र इंडिया गेट के। ।
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कउआ बइठ है
जबसे मूड़े मा कउआ बइठ है।
असगुन का लये बउआ बइठ है।।
पी यम अबास कै किस्त मिली ही
वा खीसा मा डारे पउआ बइठ है।।
होइगै येतू मंहग तरकारी
टठिया मा हमरे लउआ बइठ है।।
पर साल चार ठे दाना नहीं भा
औ सेंदुर रुपया लये नउआ बइठ है।।
घूंस मा जात बाद नही लागय
तिबारी कहिन की परउहा बइठ है।।
रोजी कै कहूँ आड़ ना अद्धत
सब हंस का कहैं भतखउआ बइठ है।।
हेमराज हंस -भेड़ा मइहर
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रोटी कै बात कर
अब रोज़ी कै बात कर रोटी कै बात कर।
गरीब हें निपर्दा लगोटी कै बात कर। ।
त्राहि त्राहि मची ही पानी कै देस मा
नाहक बहैं न पाबै टोंटी कै बात कर। ।
मुँह मा भरे बिक्ख भले 'नीलकण्ठ 'बन
समाज माही शीला सपोटी कै बात कर। ।
चाहे भले कल्लात है पै कुतकुती तो ही
भउजाई केर चींथी चिकोटी कै बात कर। ।
जे आने का गडबा खनिस ता खुद सकाय गा
अच्छाई हेर निन्दा न खोटी कै बात कर। ।
बिलार के गरे मा घंटी अब न बांध हँस
पिंजरा म बंद मिठठू चित्रकोटी कै बात क़र। ।
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चढ़ी ही धन्ना सेठी भाई
पकडे रहा मुरेठी भाई।
चढ़ी ही धन्ना सेठी भाई।।
आन के बहिनी बिटिया कही
उइं मारा थें सेटी भाई। ।
जो जोरई कै दबा न डरिहा
सब खा ल्या है घेटी भाई। ।
नेता हार लगाबै ल्याखा
को को लइ गा पेटी भाई। ।
खूब किहिन् मस्ती कलेज मा
आय गें एटी केटी भाई। ।
तुम सब आपन दुःख कहि डॉरय
ओही लाग पुनेठी भाई। ।
सबै पालटी हइ दगाहिल
को लहुरी को जेठी भाई। ।
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मोबाइल
सरासरीहन लबरी हिबै मोबाइल मा।
सुन्दर कानी कबरी हिबै मोबाइल मा। ।
क्याखर कासे प्यार की बातैं होती हैं
दबी मुदी औ तबरी हिबै मोबाइल मा। ।
विस्वामित्र मिसकॉल देख बिदुराय लगें
अहा ! मेनका परी हिबै मोबाइल मा। ।
नई सदी के हमूं पांच अपराधी हन
जाति गीध कै मरी हिबै मोबाइल मा। ।
कोउ हल्लो कहिस कि आँखी भींज गयीं
काहू कै खुश खबरी हिबै मोबाइल मा। ।
अब ता दण्डकवन से बातैं होती हैं
श्री राम कहिन कि शबरी हिबै मोबाइल मा। ।
''हँस ''बइठ हें भेंड़ा भिण्ड बताउथें
द्याखा कइसा मसखरी हिबै मोबाइल मा। ।
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य कइसा छब्बिस जनबरी।
य कइसा छब्बिस जनबरी।
मरै पेंटागन गनी गरीब
जिअय देह नंगी उघरी। ।
पंचाइत से संसद तक डाकू गुंडन का पहरा है।
शासन की हैं हियव की फूटी अउर प्रशासन बहिरा है। ।
एक न सुनै एक नहीं द्याखै कासे भइलो बात करी।
उई पीरा का पाठ पढ़ामै जेखे लगी न फांस।
भूंखा सोबइ घर का मालिक चाकर चाटय चमन प्रास। ।
ई सेबक खा ल्याहै देस का इन खे नहि आय नरी गरी।
ऐसी कै बइहर का जानै कइसा ज्याठ बड्यारा।
का जानै डनलप कै गद्दी कइसन ह्वा थै द्यारा। ।
महलन माही पले गलइचा जानै कइसा टाट दरी।
छल प्रपंच के पहिया माही लोकतंत्र कै गाड़ी।
केतू जगै रात भर हरिया खेत खा थी बारी। ।
दरबारन से चउपालन तक चारि रहें सांड वसरा पहरी।
करजा लइके खाय रहेन घी अर्थ ब्यबस्था परी उतान।
भुखमरी बेकारी बोल रही है जय जबान औ जै किसान। ।
गभुआरन कै भूंख खाय आंगनवाड़ी पगुरात खड़ी।
कउने मुँह से स्वाहर गाई गणतंत्र पर्व के बास्कट के।
हम कब तकअभिनन्दन गाई डाकू गुंडा चोरकट के। ।
सत्य अहिंसा अउर त्याग कै हमरे देश मा लहास परी।
चला मिटाई भष्टाचार ता लिख जइ नई इबारत।
अपने देस के भभिस्य का सउपी साफ इबारत। ।
गाँधी पटेल के लउलितियन के संकल्पन का पूर करी।
हेमराज या हमरे देस कै करुना भरी कहानी आय।
मदारी के रहत बंदरिया का दोख द्याब बेइमानी आय। ।
तबहिन ही छब्बिस जनबरी। य कइसा छब्बिस जनबरी।
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गदहिया काकी
एक रोज गदहा काका से कहिस गदहिया काकी।
पकिगा प्याट य भारा ढ़ोबत परै भाग मां चाकी॥
हमही परै अजार य होइ जाय कउनौ अनहोनी।
इसुर य तन लइके हमही देय मनई कै जोनी।
यतना सुनतै गदहा काकू लगें खूब अनखांय।
कहिन शनीचर तोहइ चढा है औ चटके ही बाय॥
येहिन से तुम मांगि रह्या है वा मनई का क्वारा।
जउन बरूद के गड्ड मां बइठे होइन भूंजै होरा॥
जे अपने स्वारथ मां ढड़कै मिरजापुर कस लोटिया।
पानी पी के चट्टय फ्ोरै जे पउसरा कै मेटिया॥
जे जात धरम भांषा बोली मां करबाउथें जंउहर।
जे नेम प्रेम भाईचारा से मिलैं न कबहूं जिवभर॥
जे ईटा गारा निता बहामै अपने भाई का रक्त।
भले पीलिया केर बेजरहा अस्पताल मां मरै बेसक्त॥
रक्तदान न द्याहै ओही भले सड़क का सींचै।
जउन बंदा भगतन से दइअव केर कर्याजा हीचै॥
अइसा रूक्ष दुइ गोड़ा गड़इता कै मगत्या तुम जोनी।
जे मजूर के खून पसीना कै भख लेय करोनी॥
मनई से नीक ता हमरै जात ही सुना गदहिया रानी।
चुहकै नही अरक्षण कोल्हू प्रतिभा केर जमानी॥
लख्यन लालू के ढंग का देखे रंझ ही तोहरे जिव का।
पै हम पशु पच्छिन के खातिर जीतीं अबै मेंनका॥
तुम गुलाब का सपन न द्याखा बना निराला केर कुकुरमुत्ता।
य मनई से वफादार है हमरे देस का कुत्ता॥
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हमार भेड़ा
पूरुब मा पुरान ताल फूले हें कमल जहां
अउर पच्छिम कइती जहां सदा नीरा सागरा।
दक्खिन मा राजपथ लगा थै अगस्त अस
उत्तर मा हरा भरा बिंध अस डोगरा। ।
चउकी चटकउला मा बिराजे अंजनी के लाल
ताल गहिरार नबा ताल संतोखरा।
गांव मध्ये चंडी देवी औ बिराजे भोलेबाबा
अउर श्री गनेश जू जे सिद्ध करैं अखरा। ।
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चउकी चटकउला मांही लागथाबै मेला जहाँ
लुदुइआ मा है सेबाद हुआं लड्डू पेड़ा का।
गांव कै बिबेक मान जनता मा है स्वाभिमान
अंतर वा जनाथीबै रूख अउर रेंड़ा का। ।
मेल जोल के सुभाव केर परिपाटी हिंया
मह्काबै माटी जहां पस्गाइयत मेड़ा का।
लोक रंग का उराव सब मा है एक भाव
कवि हेमराज सौ प्रनाम करै भेड़ा का। ।
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कबिता
अपना का सेतै लगै अब माख
अपना का सेतै लगै अब माख सिरी मान
,जन गन मन कै केहनी रही कबिता।
आतातायी बहेलिया के तीर के बिपछ माही ,
पंछिन के आँख केर पानी रही कबिता।।
लोकतंत्र पिअय लाग अंगरेज घाइ खून
दीन दुखियन का पीर सानी रही कबिता।
ठठुरत हरिआ खदान कै मेहरिआ कै
औ बिना बड़ेरी बाली छान्ही रही कबिता। ।
योजना से हित ग्राही जोजन खड़ा है दूर
ब्यबस्था कै कइसा के सराह बनी कबिता।
जउन भाईन केर हीसा भइबय हड़पि धरे
जरि रही छाती वखार आह बनी कबिता।।
डूबि रहे जात बाद बाली जे नहर माही ,
उनही बचामै का मल्लाह बनी कबिता।
प्रहलाद प्रेम पथ माही जे लगामै बारी ,
अइसा हिरनकश्यप का बराह बनी कबिता। ।
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नेता जी
उइ कहा थें देस से गरीबी हम भगाय देब
गरीबी य देस कै लोगाई आय नेता जी।
गरीबी भगाय के का खुदै तू पेटागन मरिहा
वा तोहई पालै निता बाप माई आय नेता जी। ।
गरीबी के पेड़ का मँहगाई से तुम सींचे रहा
तोहरे निता कल्प वृक्ष नाइ आय नेता जी।
भाषन के कवीर से अस्वासन के अवीर से
वा तोहरे बोलिआय का भउजाई आय नेता जी । ।
योजना के तलबा म घूँस का उबटन लगाये ,
भ्रष्टाचार पानी म नहाये रहा नेता जी।
चमचागीरी के टठिया म बेईमानी का व्यंजन धरे
मानउता का मूरी अस खाये रहा नेता जी।।
गरीबन के खून काही पानी अस बहाये रहा
टेंटुआ लोकतंत्र का दबाये रहा नेता जी।
को जानी भभिस्स माही मौका पउत्या है कि धोखा
लूट लूट बखरी बनाये रहा नेता जी। ।
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-------- बंदेमातरं----------------------
सरग से नीक मोरे देस कै य धरती ही,
जिव से है अधिक पियार बंदेमातरं।
रूपसी के देंह से ही स्वारा आना सुंदर य,
आपन माटी देश कै सिंगार बंदेमातरं॥
बहै नदी कलकल पानी करै छलछल,
टेराथें पहार औ कछार बंदेमातरं।
जहां बीर बलिदानी भारत का बचामै पानी,
सूली माही टगिगे पुकार बंदेमातरं॥ -
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दारू बन्द बिहार मा लागू कड़क अदेश।
भर धांधर जो पिअय खै आबा मध्य प्रदेश। ।
आबा मध्य प्रदेश हियां ता खुली ही हउली।
पानी कै ही त्रास भरी मदिरा कै बउली। ।
पी के चह जेतू मता कउनव नहीं कलेश।
नवरत्रिव पाबन्दी नहीं अपने मध्य प्रदेश।।
गांव गांव मदिरा बिकै दबा शहर के पार।
कउने शब्दन मा करी अपना का आभार।।
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हंस देख चउआन है नये नये परपंच।
भारी बहुमत जीत के मिलै न सत्ता संच। ।
मिलै न सत्ता संच उड़ रही खिल्ली।
एक एक कई टूट रही ''बहरी ''कै तिल्ली। ।
जनता बपुरी सहि रही राजनीत का दंश।
नंगदाय का देख के हक्का बक्का हंस। ।
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चांदनी
चितवाथी चरिउ कइ चरकी चमक चंद,
चपल चोचाल अस चोंख चोंख चांॅदनी।
काहू केर जिव करै पपीहा अस पिउ पिउ,
नेह स्वाति बूंद का लगाबै दोख चांदनी॥
सुकवा जो अस्त भा ता उआ है अगस्त जी मां,
प्रेम पंथ पानी काही सोख सोख चांॅदनी॥
चकई के ओरहन राहू केर गिरहन,
रहि रहि जाय मन का मसोस चांॅदनी॥
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पोखरी का पानी जब से थिराय दरपन भा,
तब से जोंधइया रूप राग का सराहा थी।
ठुमुक ठुमुक चलै लहर जो रसे रसे,
देख देख के तलइया भाग का सराहा थी॥
चांदनी से रीझ रीझ पत्ता पानी मां पसीझ,
पुरइन पावन अनुराग का सराहा थी।
जे निहारै एक टक सांझ से सकार तक,
जोंधइया चकोर के वा त्याग का सराहाथी॥
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झेंगुर कै तान सुन नाचै लाग जुगनूं ता,
अस लाग जना दीप राग तान सेन का।
भितिया मां चढि के शिकार करै घिनघोरी,
जइसन लदेन' कांही मारा थै अमेरका॥
ओस कै बूंद जस गिरत देखाय नही,
सनकी से बात करैं जइसा पे्रमी प्रेमका॥
तन केर मन से जो ताल मेल टूटिगा है,
तब से चरित्र होइगा विश्वामित्र मेनका॥
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फगुनहटी बयार
चलै मस्त बयार पिआर लागै ,महकै महुआ अस देह के फागुन।
सरसो निकरी पहिरे पियरी औ सुदिन सेँधौरा के नेह के फागुन। ।
जब काजर से मेहदी बोलिआन ता घूँघट नैन मछेह के फागुन।
औ लाजवंतीव डीठ लागै जब रंग नहाय सनेह के फागुन। ।
आसव करहा नौती कड़बा ता गामै लगा अमराई मा फागुन।
हाथी अस चाल चलै जब गोरी ता महकै हाथ कलाई मा फागुन।।
गाल मा फागुन चाल मा फागुन औ गमकत पुरवाई मा फागुन।
देस निता जे निछावर बीर ता भारत के तरुणाई मा फागुन। ।
रंग मा फागुन भंग मा फागुन उमंग उराव के कस्ती मा फागुन।
मस्ती मा फागुन बस्ती मा फागुन मिल्लस बाली गिरस्ती मा फागुन।।
दीन दुखी के मढ़ैया से लइके कोठी हवेली औ हस्ती मा फागुन।
य मंहगाई मा होरी परै कुछु आबै सह्वाल औ सस्ती मा फागुन। ।
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रात रात भर किहन तरोगा
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सगली दुनिया हिबै अचंभित
सगली दुनिया हिबै अचंभित ,दइके नाक रुमाल।
सत्य अहिंसा के धरती मा , करुणा होय हलाल। ।
छाती पीट -पीट के रोबै, साबरमती कै धारा।
अब ता बरुनव के घर माही। धधक रहें अंगारा। ।
कोउ बता द्या राजघाट मा ,गांधी जी से हाल।
जहाँ कै माटी सत्य अहिंसा केर विश्वविद्यालय।
वहै धरा मा बहै खून ,औ मार काट का परलय। ।
गौतम गाँधी के भुइ माही बसे हमै चंडाल।
भारत माता के बिटियन के मरजादा का बीमा।
अब ता उनखे बेसर्मी कै नहि आय कउनौ सीमा। ।
बड़मन्सी कै बोली ब्वालै बड़ बंचक बचाल।
काल्ह द्रोण मागिन तै अउठा ,आज लइ लइन जान।
बिद्या कै पबरित परिपाटी तक होइगै बलिदान। ।
रह्यान कबौ हम बिश्व गुरु पै आज गुरू घंटाल।
शहरन माही आजादी के होथें मङ्गलचार।
आजव भारत के गॉवन का दमै पबाई दार। ।
सामंती के दुनाली से कापि रही चउपाल।
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गाँधी जी
ओ ! राजनीत बाले जती अपना कै मरी मती गाँधी अस जती काही काहे गरिआइ थे।
बापू आय राष्ट बाप बापू आय जातक जाप गौतम केर मरजादा काहे घरिआई थे। ।
सत्ता के भूंख माही सत का मिटाय रहन जनगणमन मा काहे कलह बमुरा लगाई थे।
करी कुछु नीक निकाई बन जाबै लछमी बाई सूर्पणखा अस काहे नाक कटबायीं थे। ।
भारतीय संस्कृति मा नारी है परम पूज्य पढ़ लेइ इतिहास अपना जीजा दुर्गावती कै।
पन्ना धाय अस तप त्याग अनुराग करी कहानी बन जाब अपनव रानी रूप मती कै। ।
मेघा औ टेरेसा अस जन कल्याण करी वतरय पुन मान होइ कुमारी माया वती कै।
कुरसी के तीन पांच मा कुलांच कै न आंच देई भारत माही पूजा हो थी त्याग दया मती कै। ।
अपना से करी चेरउरी नफरत कै न बांटी रेउरी सत्ता केर मउरी या सेरा जई सिताप मा।
काहे बिनाश केर रास तुम रचाय रह्या राग द्वेष इरखा भासा बानी पाप मा। ।
देस का बिकास होइअनेकता के एकता मासब कै सुख शांती ही मनसा बाचा जाप मा।
गाँधी आय गीता रामायण गाँधी आय नर मा नारायण पै तुम हेरे मिलिहा न कऊनव किताप मा। ।
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मस्त माल है।
देस मा चारिव कइती दहचाल है।
फुर फुर बताबा का अपना का मलाल है।।
दिल्ली अपने मन कै बात बाँचा थी
कबहूँ नहीं पूछिस कि देसका का हाल है। ।
कूकुर के चाबे मा भोंका थी मीडिआ
गऊशाला नहीं झांकै की भूसा पुआल है। ।
सरकारी दफ्तर मा घूंस बिना काम नहीं
हर कुरसी पाले एकठे दलाल है। ।
हमरे संस्कार का येतू पतन भा
वा बहिनी बिटियन का कहाथै मस्त माल है। ।
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जब से आपन गाँव।
शहर मा जाके रहय लाग जब से आपन गाँव।
भरी दुपहरी आँधर होइगै लागड़ होइ गै छाँव। ।
गाँवन कै इतिहास बन गईं अब पनघट कै गगरी।
थरी कोनइता मूसर ज्यतबा औ कांडी कै बगरी। ।
गड़ा बरोठे किलबा सोचइ पारी आबै माव ।
हसिया सोचै अब कब काटब हम चारा का ज्यांटा।
सोधई दोहनिया मा नहि बाजै अब ता दूध का स्यांटा। ।
काकू डेरी माही पूंछै दूध दही का भाव।
दुर्घट भै बन बेर बिही औ जामुन पना अमावट।
''राजनीत औ अपराधी ''अस सगली हाट मिलावट। ।
हत्तियार के बेईमानी मा डगमग जीवन नाँव।
जब से पक्छिमहाई बइहर गाँव मा दीन्हिस खउहर।
उन्हा से ता बाप पूत तक करै फलाने जउहर। ।
नात परोसी हितुअन तक मां एकव नही लगाव।
कहै जेठानी देउरानी के देख देख के ठाठ ।
हम न करब गोबसहर गाँव मा तोहरे बइठै काठ। ।
हमू चलब अब रहब शहर मा करइ कुलाचन घाव।
नाती केर मोहगरी ''आजा'' जुगये आस कै बाती।
बीत रहीं गरमी कै छुट्टी आयें न लड़िका नाती। ।
खेर खूंट औ कुल देउतन का अब तक परा बधाव।
ममता के ओरिया से टपकैं अम्माँ केर तरइना।
फून किहिन न फिर के झाँकिन दादू बहू के धइना .। ।
यहै रंझ के बाढ़ मां हो थै लउलितियन का कटाव।
शहर मा जाके ----------------------------------------
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होरी
कइसन होरी खेलै जनता रोरी हबै न रंग।।
पानी तक ता दुरघट होइगा कइसा घोटै भंग।।
दांती टहिआ कलह दंभ का हिरना कश्यप राजा।
राजनीत होलिका बजाबै नफरत बाला बाजा।।
प्रहलाद प्रेम भाईचारा कै नहिआय कहूं उमंग ।
महंगाई बन के आई ही हमरे देस मा हुलकी।
तब कइसन के चढै करहिआ कइसन बाजै ढोलकी।।
भूंखे पेट बजै तब कइसा या खंझनी मृदंग।।
फूहर पातर भासन लागैं होरी केर कबीर।
छूंछ योजना कस पिचकारी आश्वासन का अबीर।।
लकालक्क खादी कुरथा मा भ्रष्टाचारी रंग।
कुरसी बादी राजनीत मिल्लस का चढाबै फांसी।
आपन स्वारथ सांटै खातिर पंद्रा अउर पचासी।।
जने जने की आंखी भींजीं दुक्ख सोक के संग।।
कइसन होरी खेलै जनता रोरी हबै न रंग।।
हेमराज हंस - भेड़ा मैहर
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मैहर 29 मई 1997
मैहर है जहां बिद्या कै देबी बिराजीं मां शारद शक्ति भवानी ।
पहिलय पूजा करै नित आल्हा औ देबी के बर से बना बरदानी।।
मैहर है जहां लिलजी के तट मठ माही सिव हे अउघर दानी।
मैहर है जहां संगम है सुर सरगम कै झंकार सुहानी।।
पै 29 मई 97 कां हि पतझर घांई निझर गा तै मइहर।
सरकारी गुंडन के गोली औ डंडन से जलिआ कस बाग उजर गा तै मइहर।।
सारद माई का पावन तीरथ मरघट घांई व जल गा तै मैहर।
सायरन सींटी अन्याय अनीती औ करफू के पांव चहल गा तै मैहर।।
खून कै नद्दी बही हेन दद्दी पै डोला न दिल्ली भोपाल का आसन।
गृह मंत्री जी संतरी तक नहि भेजिन न आये हेन दिग्गी प्रदेश के सासन।।
मैहर है जहां खेली गै ते मजदूर के रक्त से खून कै होरी।
तड़तड़ गोली धसी जहां सीना मा मारिन तै निर्दयी अखोरी। ।
लहास बिछाय दइन सड़कन मा लागै नगर बिना धनधोरी।
ईट औ पाथर तक जहा रोयें ते पै न पसीझे उंइ खूनी अघोरी।।
न्याव के मांगे मा मांग का सेदुर पोछ के होइगा कलंकित मैहर।
श्रमिकन का जहा खून बहा औ घायल रक्त से रंजित मैहर।।
मानउता किल्लाय उची पै करुना दया से है खंडित मैहर।
आजौ गुलामी औ डायर हें इतिहास के पन्ना मा अंकित मैहर।।
29 मई 97 कहि केत्तव का पालन हार गुजर गा।
केत्तिव राखी भयीं बिन हांथ अनाथ व केत्तेव बचपन कर गा।।
नहाय गा खून से मैहर पै बरखास न भा एक थाने का गुरगा।।
अंगना मा जेखे भयीं है कतल अब छान करी वा सारद दुरगा।।
अहिंसा के नाती हे हिंसक घाती औ उनखर आंखी हिबै बिन पानी।
जइसन आस करै कोउ कोकास से ओइसय होइगै जांच कहानी।।
न्याव के हँस का खाय गें कंस छनाइन बगुला से दूध का पानी।
'हँस' उरेही कसाई के पाप का जब तक हांथ रही मसियानी।।
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चिठ्ठी
आजु दुइ बजे रजधानी से एक ठे चिठ्ठी आई।
वमै लिखा तै मतदाता का मूर्ख दिवस कै बधाई।।
जउन चुनाव जिताया हमही वाखर हयन अभारी।
हमरव भाव बढे हें खासा मंडी कस तरकारी।।
जबसे चुन के भेज्या हमही लगा थी लमहर बोली।
यहै बहाने लोकतन्त्र से हो थी हंसी ठठोली।।
भुखमरी बेकारी टारैं बाली हमसे कर्या न आस।
ईं चुनाव के मधुबन माही आहीं सइला रास।।
टी बी माही देखत्या होइहा उजर भभिस्य के धइना।
हम अंधरन के घर लगबाउब चार चार ठे अइना।।
बड़े भाग से हम बन पायन गद्दी के अधिकारी।
दिन बीतै ऊंटी सिमला मा क्लब मा रात गुजारी।।
संपाती अस सुरिज के रथ कै मन मा ही लउलितिया।
चाहे केत्तव नफरत बाली ठाढ होइ जाय भितिया।।
जइसा सब का जान्या मान्या ओइसय हमीं समोखा।
हमरेन दारी खोल त्या हा सिद्धांतन केर झरोखा।।
हरबिन मिलब आय के तोहसे कइके खाली कोस।
हम छानी हेन माल पुआ तुम रहा ब्रते परदोष।।
एक मतदाता पढ के चिठ्ठी चट्टै लिखिन जबाब।
अपना परंपरा का पाली हम ठगर्रत जाब।।
पै नोन का कान करा थै कंजर येतू लाज ता राखी।
भार उचाई हम कांधा मा अपना सेंतै कांखी ।।
हम मान्यन कोकास की नाई ही अपना कै पांत।
दरसन एकता केर मिला थें धन्न अपना का साथ।।
पै संपाती के लच्छन छ्वाड़ा बन जा गरुड़ जटाऊ।
येत्तेन माही लोकतंत्र कै बदल जइ जलबाऊ।।
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ओ पापी लुच्चा तै पाक
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ओ पापी लुच्चा तैं पाक तोही नही आबै लाज,
जउन साज साज घुसपइठ तैं करउते हे।
लगथै कि भूलि गये गिनती हिजड़ी सेना केर,
पुनि के तै वाखर जन संख्या गिनबउते हे॥
तोरे इतिहास माही नही कुछु रास भांस ,
हमरे भूंगोल माही पीठ तैं दतउते हे।
अइहे जो तैं कश्मीर सेना डारी सीना चीर,
दुइ दारी त देखि चुके पुनि अजमउते हे॥
भारत के मांटी केर वीरता कै परिपाटी,
बांच ले पुरान चाह नये इतिहास का।
भारत के मांटी माही हें जवान वीर शेर,
हेर हेर बीन ल्याहैं धरती अक्काश का॥
मुंह देखी मेलजोल पीठ पीछ बैर मोल,
तोर दोगली य चाल दुअरा विनाश का।
अरे दीदी जो पिआये दूध करदे एलान जुद्व,
जिंदय मां बनबा ले कब्र अपने लहास का॥
हिमालय से ज्वालामुखी फूट के निकर परी,
सह पइहे आंच तै न हिन्दुस्तानी वीर के।
वा दारी त दुर्गा रहीं य दारी हें महाकाल,
भुट्टो अस होइ हाल तोरव त अखीर के॥
रे ढीठ नीच मान बात कर न तै उत्पात,
भारतीय भूंगोल मांही सरहद तीर के।
जब तक सुरिज औ चन्दा हें अकास मांही,
धरती मां लहरइ तिरंगा कश्मीर के ॥
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सुन इस्लामबाद
⸎⸎⸎⸎⸎⸎⸎⸎⸎⸎⸎⸎⸎⸎⸎
अब दिल्ली ललकार उची,सुन रे इस्लामाबाद।
कोलिया के झगड़ा मां अबकी बिक जइ सगला बांध ॥
नीक के आखर आंखर पढ,इतिहास पोथन्ना खोल।
हमहिन आह्यन वहै वंश,जे बदल दइस भूंगोल॥
बंग्लादेश के बदला बाली, पूर न होई साध।
अब दिल्ली...............................................
हम तोही मउसी अस लड़िका,अपने जिव मां चाही।
हमरेन घर मां सेंध मार तैं, करते हये तबाही॥
बे कसूर के हत्या का तै,कहते हये जेहाद'॥
अब दिल्ली.......................................................
हमरे देस मां करै उपद्रव, तोर गुप्तचर खुपिया।
हांथ मिलामैं का रचते हे,तै नाटक बहुरूपिया॥
एक कइ उत्पात कराउते,एक कइ संवाद॥
अब दिल्ली..........................................
हमरे देस कै पोल बतामै,मीरजफर के नाती।
तोरे भिरूहाये मां बनिगें महतारी के घाती॥
महावीर अब्दुल हमीद कै हमी न बिसरै याद।
अब दिल्ली..........................................
खूनी आतंकवादीन का तै अपने घरे लुकाउते।
औ उपर से हमहीं सोला दूनी आठ पढाउते॥
भारत के हर गाँव गली मां उूधम सिंह कै मांद।
अब दिल्ली ललकार उची सुन रे इस्लामा बाद॥
कोलिया के झगड़ा मां अबकी बिक जइ सगला बांध।
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भारत के रणचंण्डी का
डट के खूंन पिआया बीरव भारत के रनचंडी का।
लाहौर पेशावर मां गाड़्या अब जाय तिरंगी झंडी का॥
कहि दिहा हिमालय से संदेश कि वा है अबै अनाथ नही।
सागर का बड़वानल उत्कल द्रविण विन्ध्य है साथ महीं॥
बीर शिवा जी केर जोश औ टेई धरी भवानी ही।
दुश्मन का खून पिअय खातिर हेन तड़पत ठाढ़ जबानी ही॥
छिन मां तहस नहस कइ द्याहै आतंकबादी मंडी का।
डट के खूंन ............................................................
पुनि के खउलै लाग खून अब राजस्थनी माटी का।
जाट गोरखा तामिल तेलगू बलिदानी परिपाटी का॥
प्लासी बक्सर असम कोहिमा संन्नासी कालिंग का।
देसभक्त पंजाब का पानी औ गढवाली सिंह का॥
सगला देस साथ मां तोहरे राजमार्ग पगडंडी का।
डट का खून......................................................
रूण्ड मुंण्ड कै माला पहिरे काली रन मां निकर परी।
औ महाकाल कै तीसर आंखी प्रलय भयंकर उघर परी॥
अब की दारी द्याव ठीक से द्याब पाक अउठेरी का।
आर पार तक रार ठनी अब बजैं द्या रनभेरी का॥
ओ बीर जबानव सबक सिखाबा कालनेमि पाखण्डी।
डट का खून......................................................
वा भूल चुका इंदिरा जी का दुर्गा कै पदवी पाइन तै।
नब्बे हजार पकिस्तानिन से कनबुड्डी तनबाइन तै॥
भूंगोल बदल गै दुनिया कै तब मुंह से कढी अबाज नही।
पुनि भडुअन कै फउज जुरी नकटन का आबै लाज नही॥
हम राणा प्रथ्वी के बंसज वा गोरी कू्रर शिखंडी का।
डट के खूंन पिआया बीरव भारत के रनचंडी का॥
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सब मनसेरुआ हें
गरीबन के खातिर सब मनसेरुआ हें।
बिचारे के खटिआ मा तीन ठे पेरूआ हें। ।
चाह एक तंत्र हो या कि लोक तंत्र
कबहुं पकड़ी कालर गै कबहूं चेरुआ हें।।
उइ कहा थें भेद भाव काहू से नहीं
पै कोठी का चुकंदर कुटिआ का रेरुआ हें।।
राबन का सीता मइया चिन्हती हैं नीक के
तउ देती हइ भीख ओखे तन मा गेरूआ हें।।
गरमी कै छुटटी भै ता हंस चहल पहल ही
मामा के घरे बहिनी औ भइने बछेरुआ हें।।
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आबा मुखिया जी स्वागत है
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आबा मुखिया जी स्वागत है।
शारद मइया कै धर्म भूमि।
य 'बाबा 'जी कै कर्म भूमि। ।
भुइ गोलामठ औढरदानी कै ।
सम्पत तेली बलिदानी कै। ।
मुड़िया बाबा के धूनी मा
बंदन अभिनन्दन शत शत है। ।
आबा मुखिया जी स्वागत है। ।
हेन ही मिल्लस कै परिपाटी।
पुरवा ,ओइला ,गणेश घाटी। ।
औ रामपुर के राधा किशना।
दर्शन से मिटै धृणा तृष्णा। ।
बड़ा अखाडा मा मनस्वनी
कै पयस्वनी निकरत है। ।
आबा ---------------------
या विंध्य द्धार लेशे है कलश।
पानी लये कलकल बहै टमस। ।
जब से ठगि के गें हें कुम्भज।
ता विंध्य का निहुरा है गुम्मच । ।
गुरू अगस्त के निता झुका है
या अटल झुकेही का ब्रत है। ।
आबा मुखिया ----------------
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काल्ह मिला
काल्ह मिला एक ठे प्रत्याशी।
मिलनसार कर्मठ मृदु भाषी। ।
ईमानदार औ खूब जुझारू।
पिये रहा घुटकी भर दारू। ।
छरकाहिल जे रहा काल्ह तक
देखतै हमही सघराय लग।
तन से मुरइला मन से नाग। ।
मुँह मा लये बिदुरखी बासी।
काल्ह-----------------
व विकास कई करै न बात।
लगा गिनामै जात औ पात। ।
बाम्हन ठाकुर काछी पटेल।
राजनीत कस ख्यालै खेल। ।
पिछड़ा पन्द्रह और पचासी।
काल्ह ------------------
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शौचालय बनवाबा
शौचालय बनवाबा भाई शौचालय बनवाबा।
अपने घर के बड़मंशी का बहिरे न बगवाबा। ।
हमरी बहिनी बिटिया बहुअय बपुरी जांय बगारे।
यहैं तकै झुकमुक ब्यारा का वहै उचै भिनसारे। ।
घर के मरजादा का भाई अब न यतर सताबा।
शौचालय बनवाबा भाई शौचालय बनवाबा। ।
फिरंय लुकाये लोटिया बपुरी मन मा डेरातीं आप।
निगडउरे मा बीछी चाबै चाह खाय ले सांप। ।
सबसे जादा चउमासे मा हो थें जिव के क्याबा।
शौचालय बनवाबा भाई शौचालय बनवाबा। ।
तजी सउख मोबाइल कै औ भले न देखी टीबी।
शौचालय बनवाई घर मा अपना हन बुधजीबी। ।
सरकारव कइ रही मदद औ कुछ अपने से लगाबा।
शौचालय बन बनवाबा भाई शौचालय बनवाबा। ।
जब घर मा शौचालय होइ ता ही घर कै सज्जा।
तब न खेत बगारे बागी अपने घर कै लज्जा। ।
करा कटौती अउर खर्च कै निर्मल घर बनवाबा।
शौचालय बनवाबा भाई शौचालय बनवाबा। ।
शौचालय बनवाय घरे मा चला गंदगी पहटी।
पाई साँस जब शुद्ध हबा हरहजा रोग न लहटी। ।
चला 'हंस 'सब जन कोऊ मिल के य संकल्प उचाबा ।
शौचालय बनवाबा घर मा शौचालय बनवाबा। ।
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****************** चुगल खोर******************
हम करी चेरउरी चुगल खोर तुम सुखी रहा य देस मा।
तुम बइठे नक्कस काटा औ सब जन रहैं कलेष मा। ।
हे अकरमन्न हे कामचोर सब काँपैं तोहरे दांव से।
कड़ी मशक्कत के कर्ता तक भागै तोहरे नांव से। ।
तुमसे सब है कारबार जस धरा धरी है शेष मा।
हे चापलूस चउगिर्दा हेन तोहरै तोहार ता धाक हिबै।
तोहरेन चमचागीरी से हमरे नेतन कै नाक हिबै। ।
तुम कलजुग के देउता आहू अब माहिल के भेष मा।
हे !महा दोगला हे अकही !!अकहापन कै पूंजी तुम।
बड़ा मजा पउत्या है जब आने कै करा नमूजी तुम। ।
गद गद होय तोहार आतिमा जब कोउ परै कलेस मा।
तुम 'मनगवां के कुकूर कस ' चारिव कइती छुछुआत फिरा।
मुँह देखी मा म्याऊ म्याऊ औ पीठ पीछ गुर्रात फिरा। ।
सगले हार तोहार असर है देस हो य परदेस मा।
केत्तव होय मिठास चाह छिन भर मा माहुर घोर द्या।
तुम भाई हितुआ नात परोसी का आपुस मा फोर द्या। ।
तोहरे भीरुहाये मा पति -पत्नी तक चढ़ गें केस मा।
हे मंथरा के भाई तुम जय हो हे नारद के नाती।
नाइ दुआ करत बागा बे डाक टिकस कै तुम पाती। ।
हे राम राज के 'धोबी 'तुम घुन लाग्या अवध नरेश मा ।
हम करी चेराउरी चुगल खोर तुम सुखी रहा य देस मा। ।
हेमराज हंस -- भेड़ा मइहर
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अछूत
जुगन बीति गें पुरखन पीढ़ी पियत य माहुर घूंट।
अपनेन देस के माटी मा हम कब तक रहब अछूत। ।
एक दइव की हम सन्तानै कहै पुरान औ वेद।
तब काहे का छुआ छूत औ जातपांत का खेद।।
इसुर ता सब के बांधे है लाल रंग का सूत।
अपनेन देस के-----------------------
हमिन रची देवालय का औ मूरत हमिन बनाई।
औ जब पूजा करय जई ता भीतर घुसै न पाई। ।
हमरे पुजहाई टठिया का पंडित कहैं अछूत।
अपनेन देस के..............
रामराज भें उदय राज ता खूब मचाया हल्ला।
पै समाज के या कुरीत का किहा न एकव तल्ला। ।
कइसा रुकी धरम परिवर्तन या तोहरे करतूत।
अपनेन देस के............................................
धरम कै चिन्ता ही ता पहिले छुआछूत का म्याटा।
आन कै फूली पाछू झांक्या देखा आपन टयाँटा।।
''ईश्वर अंसही कछु नहि भेदा ''तुलसी कै कहनूत। ।
अपनेन देस के माटी मा हम कब तक रहब अछूत। ।
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हम सरबरिया बाम्हन आह्यन
हम सरबरिया बाम्हन आह्यन मिलब साँझ के हाउली मा।
मरजादा का माजब धोऊब नरदा नाली बाउली मा। ।
होन मेल जोल भाई चारा कै साक्षात् हिबै तस्बीर।
नक्सल्बादी असम समिस्या औ नहि आय झंझट कश्मीर। ।
अगड़ा पिछड़ा आरछन का लफड़ा बाला नहि आय भेद।
जात -पात अउ छुआछूत के ऊंच -नींच के नहि आय खेद। ।
समता मिलै हँसत बोलत होन पैग भजिआ लपकाउरी मा। ।
एक नाव एक भाव मा बइठे मिलिहै राजा रंक औ फक्कड़।
बड़े -बड़े परदूसन प्रेमी मिलिहै सुलगाये धुँआ औ धक्कड़। ।
रक्शा बाले -नक्शा बाले शिक्षा स्वस्थ्य सुरक्षा बाले।
बने पुजारी सरस्वती के अद्धी पउआ बोतल घाले। ।
बड़े शान से भाषन झारत मद्ध निषेध के रैली मा। ।
भले दये अदहन चुलबा मा ताकै टोरबन कै महतारी।
औ हमार या अमल सोबाबै रात के लड़का बिना बिआरी। ।
हमही चाही रोज साँझ के मुर्ग मुसल्लम पउआ अद्धी।
शहर गॉव मा लूट मार कई देइ ढ़ील कनून कै बद्दी। ।
हम बिन सून ही राजनीत जस खरिहान कुरईली मा। ।
महुआ रानी पानी दय दय हमही बनै दिहिस लतखोर।
पहलमान अस अकड़ रहे हन भले हबै अंतस कमजोर।।
बीस बेमारी चढ़ी है तन मा तउ नही या छूटै ट्याव।
मदिरा तजा विक्ख की नाइ डिग्गी पीटा गांव -गांव। ।
नही पी जयी या समाज का बगाई कौरी कौरी मा।
चला करी प्रण आइस भाई कोउ जाय न हौली मा। ।
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हमरे घर के आगी का
बदला नाव बैसुन्दर होइगा।
जे आने का हड़पिस हीसा
ओही आज भगन्दर होइगा। ।
लोभ दिहिन उई बन के बदरी
फसल जमी ता निचंदर होइगा। ।
बन गा सोने का मृग मामा
औ साधू दसकंधर होइगा। ।
पुन के छली जई अब वृंदा
आतताई जलंधर होइगा। ।
चुहकै लगे ख़ून जनता का
उनखर पेट सिकंदर होइगा। ।
जहा समाती है सब नदिया
वाखर नाव समन्दर होइगा
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रोजी कै बात कर
रोजी कै बात कर रोटी का बात कर.
गरीब हें निपरदा लगोटी कै बात कर।।
त्रहि त्राहि मची ही पानी कै देस मां
नाहक न बहैं पाबै टोंटी कै बात कर।।
भरे कंठ माही बिक्ख नीलकंठ बन,
समाज माही सीलासपोटी कै बात कर।।
भले कल्लाथै पै कुतकुती तो ही,
भउजाई केर चींथी चिकोटी कै बात कर।।
जे आने क खनिस गड़बा आपै सकाय गा,
नीकी हेर निंदा न खोटी कै बात कर।।
बलार के गरे मां घंटी न बांध हंस
पिंजरा बंद मिठ्ठू चित्रकोटी कै बात कर।।
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बघेली गजल
ठोंका तुहू सलामी भाई।
भले देखा थी खामी भाई। ।
केत्तव मूसर जबर होय पै
वमै लगा थी सामी भाई। ।
सत्तर साल के लोक तंत्र का
ग्यारै लाग बेरामी भाई। ।
एक कइ पचके हें गलुआ
औ एक कइ ललामी भाई। ।
पता नही धौ घुसे हें केत्ते
बड़ी जबर ही वामी भाई। ।
केखर केखर मुँह सी देहा
सबतर ही बदलामी भाई। ।
भले खा थें उई हराम का
पै न कह्या हरामी भाई। ।
'हंस 'करय अनरीत अम्मलक
भरा हुंकारी हामी भाई। ।
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बघेली गजल
गुड़ देखाय के गूड़ा कै बात करा थें।
मूड़ घोटाय के जूडा कै बात करा थें।।
कहां से उनखे देहें का खून खऊलय,
चूड़ी पहिर के चूड़ा कै बात करा थें। ।
बपुरी देस भक्ती बिहोस परी ही ,
चाबिस ही बीछी सूंडा कै बात करा थें। ।
घोटालन का घुरबा लगा है भोपाल मा ,
चौपालन से बहरी कूड़ा कै बात करा थें। ।
खेत -खरिहान बेचै कै तयारी ही,
बखरी के बखारी से पूड़ा कै बात करा थें। ।
बहिगै सत्ता के धारा मा ३७० ,
नाटक मा मदारी जमूरा कै बात करा थें। ।
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जातिहाई का जानिगें उइ अटकर अंदाज।
सुदिन देख ह्यराय चलें जब बिटिया का काज। ।
जब बिटिया का काज जबर है दइजा नाहर।
सुन दहेज़ का भाव थूंक न निकरै बाहर। ।
बिन दइजा के बड़ मंशी का को अपनाई।
हंस कहिन बस वोट के खातिर ही जातिहाई।।
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भ्रष्टाचार मा लग रहा एकव नही लगाम।
बिना घूँस के होय न एकठेव लिग्धा काम। ।
एकठेव लिग्धा काम कि जनता ही चउआनी।
हाहाकार मचा है बाउर ही रजधानी। ।
चाहे राशन कार्ड हो या कि हो आधार।
रिसवत हर जंघा लगी पसरा भ्रष्टाचार। ।
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अम्मा हमहूं करब पढाई
.....................
अम्मा!हमहूं करब पढाई।
हम न करब घर कै गोरूआरू
औ न चराउब गइया।
कह दद्दा से जांय ख्यात
औ ताकै खुदै चिरइया॥
हम न करब खेतबाई।
अम्मा.........................
आज गुरूजी कहिगें हमसे
तु आपन नाव लिखा लया।
पढ लिख के हुशिआर बना
औ किस्मत खुदै बना ल्या॥
येहिन मां हिबै भलाई।
अम्मा..........................
गिनती पढबै पढब दूनिया
बाकी जोड़ ककहरा।
अच्छर अच्छर जोड़.जोड़ के
बांचब ठहरा ठहरा॥
औ हम सिखब इकाई दहाई।
अम्मा.............................
हम न खेलब आंटी डंडा
औ न चिरंगा धूर।
पढब लिखब त विद्या माई
द्याहैं हमी शहूर॥
करब देस केर सेवकाई।
अम्मा ......................
बहुटा गहन कइ अंउठा
लगा के दद्दा कढैं खीस।
देंय बयालिस रूपिया बेउहर
लिखै चार सौ बीस ॥
ल्याखा ल्याबै पाई पाई।
अम्मा हमहूं करब पढाई॥
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पावस कै रित
रिमझिम रिमझिम मेंघा बरखै थिरकि रही पुरवाई।
धरती करै सिगार सोरहौ पावस कै रित आई॥
भरे डवाडब ताल तलइया कहूं चढी ही बाढ।
एकव वात न लेय किसनमां जब से लगा अषाढ॥
बोमैं बराहैं नीदै गोड़य करैं नीक खेतवाई।
रिमझिम.........................
भउजी बइठे कजरी गउतीं भाई आल्हा बांचै।
टिहुनी भर ब्वादा मां गाँवन की चउपालै नाचै॥
करय पपीहा गोइड़हरे मां स्वाती केर तकाई।
रिमझिम.......................
गउचरनै सब जोतर गयीं ही रखड़उनी मां बखरी ।
धधी सार मां गइया रोउत खूब बमातीं बपुरी॥
मइया धेनु चरामै जइहौं'' मचले किशन कन्हाई॥
रिम झिम..........................
चउगानय अतिक्रमण लीलगा लगी गली मां बारी।
मुड़हर तक जब पानी भरिगा रोमय लाग ओसारी॥
कहिन फलाने खूब फली= पटवारी कर मिताई।
रिमझिम.................
चुंअय लाग छत स्कूलन कै दइव बजाबै ढोल।
एक दउंगरै मां लागत कै खुलि गै सगली पोल॥
विद्या के मंदिर मां टोरबा भीजत करै पढाई।
रिमझिम.......................
जब उंइ पउलै लगें म्यांड़ ता लाग खेत का सदमा।
दोउ परोसी लपटें झपटे हीठै लाग मुकदमा॥
सरसेवाद त कुछू न निकला करिन वकील लुटाई।
रिमझिम...........................
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आई शरद् रित
......................
गइल सूखि गै गलिहारन कै कांदौ कुछू टठांन।
नदिया नरबा ताल का पानी निकहा हबै थिरान॥
जमगै घाट घाट मां काई।
आई शरद.............
हरूहन धानै खरिहानन कै बन आई मेहमान।
बोई हड़हन बाली अरसी अकुरी औ हरिआन॥
खेतन मां लगी जोताई।
आई..........................
सुदिन साख के सुने संदेशा उनखे मन मां दुःख भा।
पिया मिलन के गइल मां गोई साम्हूं ठाढ है सुकवा॥
कब अइहैं पंडित नाई।
आई ..........................
कहैं परोसिन पिया से अपने अब न खेला ताश।
तोहरे आल्हा बांचत कढिगा य सगला चउमास॥
परा सगली ही ख्तवाई।
आई...............................
दओ पोलका भउजाई का हार हार से फट गा।
मेंहदी महाउर काजर टिकुली सेंदुर तक ता घट गा॥
अब ता कहु करा कमाई।
आई.............................
नीक लाग जब गया बिआहैं बांध झापि अस मउर।
मोरव करम फूटगे साजन तोहरे डेहरी ठउर॥
कइसां निबही अउर निभाई।
आई शरद रित आई॥
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तोर बिदुरखी देखी थे
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तुम हमार आंसू द्याखा, हम तोर बिदुरखी देखी थे।
हाथे मां रिमोट लये हम, आपन कुरकी देखी थे॥
तालेवर कै सांटीफिकिट, उंइ देथे छब्बिस रूपिया मां,
एतर गरीबी कै तउहीनी, फुरहिन फुर की देखी थे॥
नये थाल मां बासी रोटी, परसी गै सब दिन एतरै,
मुलुर मुलुर हम रजधानी कै, धमकी घुड़की देखी थे॥
देवी फिरै बिपत कै मारी, पंडा कहै मोही कला बताव,
गांव गांव मां करतूतै हम, भंइसासुर की देखी थे॥
कोउ नहि दूध का ध्वाबा राजनीत के पेशा मां,
सांझ सकारे चाह पियत हम,खबर कै सुरखी देखी थे॥
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आंगुर आंगुर
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आंगुर आंगुर नाप नाप के,जे पालिस लै कइंया।
महतारी औ बाप का मानै , दादू अंगा अंइया॥
बारूदन का पानी से , माचिस मां बड़ा भरोसा,
पता नही धौ कउन बात मां,को मिल जाय किरइया॥
बसुधैव कुटुम्बं केर भावना, देखा केतू सकिली,
अब आपन संसार कहाबै ,लड़िका सजनी सइंया॥
बड़े अपनपौ के विज्ञापन, अस रोज छलै,
ओहिन का जुग सांझ सकारे,रोज पराथै पइंया॥
भीतर से हें अनमन अनमन,औ गद्गद् बहिरे,
चीन्हे तक नही पावै बपुरे, को आपन अनगइंया॥
खूब तिपै सूरज ता देखा, हीठत हबै अकेले,
शीतल हिबै जोधइया ता रहतीं हैं साथ तरइया॥
महतारी के तेरही मां, लड़िकन मां रार ठनी,
केखर केतू लगा है खरचा,हीसा केर रूपइया॥
पीरा का अनुवाद करा थें,टप टप आंखिन अंसुआ,
आज के सरमन मात पिता कै कराथे दइया मइया॥
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रात रात भर
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रात रात भर किहन तरोगा हम जेखे अगुवानी मां।
बड़े सकारे मरे मिले उंइ एक चुल्लू भर पानी मां॥
कोउ नही सुनइया दादू चह जेतू नरिआत रहा,
सगला देस सुनिस अन्ना' का जब बोलिन रजधानी मां॥
नंच नंच आँखिन से झांकै बड्डे जबर सपन,
बोली बड़ी पिआर लगाथी तोतली बानी मां॥
शक के नजर से देखे जाथें जब साधू संन्नासी तक,
कइसा उनही रिस न चढी आतंकिन के मेहमानी मां॥
भला पेटागन रहि के कउनौ महाशक्ति का देस बनी,
जेखर जनता भूंखी नंगी टुटही छान्ही मां॥
खूब पैलगी होथी जेखर औ समाज मां मान हबै,
उनही सांझ के हम देखे हन गिरत भंजत रसदानी मां॥
जिअत अगाधैं मरे सराधैं हमरे हेन अनरीत हिबै,
सरमन' सब दिन मारे गे हें सत्ता के मनमानी मां॥
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पीर जानाथें
जेखे बहिनी बिटिया ही ओइन पीर जानाथें।
दरबार का बेउहार द्रोपदी के चीर जानाथें॥
तसलीमा नसरीन फिफिआत बागा थी,
हमरे सभ्भ समाज के वजीर जानाथें॥
कटाउतीं हैंकइसा नाक प्रगतिशील सुपनखा,
मरजाद के रखइया रघुवीर जानाथें॥
उंइ दुइ मुहा सिद्धांत जिअय केर आदी हें,
य पोल पट्टी कबीर जानाथें॥
वा काने मां काटा ठोक के बिदुरात चला गा,
य पीर अहिंसा के महावीर जानाथें॥
फलाने के मढइया तक पहुंचा नही अजोर,
लाल किला के कलश प्रचीर जानाथें॥
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करा खूस
उंइ कहिन आज हमसे घर मां,अब तुमहूं त कुछ करा खूस।
देखत्या है उनही तिपैं ज्याठ, तुम हया जड़ाने मांघ पूस॥
अरे कहूं रोप एकठे बिरबा, आपन फोटो खिंचवा लेत्या।
औ पर्यावरणी प्रेमिन मां, अपनौ नाव लिखवा लेत्या॥
पुन रेंजर से कइ सांठ गांठ, ठेका लइ लेत्या जंगल का।
जब अपनौ टाल खदान चलत,परसाद चढत हर मंगल का॥
गलिहारव हेरत रहै छांह, औ गोरूआ हेरैं घास फूस।
अब तुमहूं...........................
विद्युत मंडल बालेन से , तुमहूं हितुआरथ कइ लेत्या।
पुन चलत ठ्यसर मोटर चक्की,लुग्गी से स्वारथ कर लेत्या॥
कुछ लइनमैन का दइ दीन्या,त व बिजुली अस गोल रही।
औ अपनेव बिजली चोरी कै,दबी मुदी सब पोल रही॥
जब अधिकारी दउरा करिहैं,त वहै बनी आपन जसूस।
अब तुमहूं......................
बन जात्या कोटेदार तुहूंकइ जोर तुगुत कउनौ ओठरी।
करत्या पुन कालाबाजारी तुम उचित मूल्य के बोर्ड तरी॥
तेल चिनी औ चाउर से, जब चकाचक्क आनंद रहत।
औ सहबौ का थक्की भेजत्या, ता उनहूं का मुंह बंद रहत॥
सब बनगें कोटेदारी से, का तोंहरेन दारी परा उूंस।
अब तुमहूं.......................
तुमहूं ता तन से हया उजर, मन भले हबै सांमरपानी।
अपनेन ख्वांपा से शुरू करा, उतिना पहिले अपनै छान्ही॥
सरमन'कै भगती छ्वाड़ा, सह पइहा न कमरी का भार।
भाईन का हीसा हड़प हड़प, होइ चला चली पहिले निनार॥
जरजात लिखा ल्या नामे मां पटवारी का लै दै के घूंस।
अब तुमहूं त कुछ करा खूस॥
गीता कुरान औ बाइबिल का, चल कउनौ चाल लड़ा देत्या।
देस भक्त के पोथी मां तुम अपनौं नाव चढा लेत्या॥
भाईचारा का बिख दइके, दुध पिअउत्या दंगन का।
पर्दा का पल्ला छाड़ा, है नओ जमाना नंगन का॥
तुष्टीकरण के पुस्टी माही, कौमी एकता का जलुस।
अब तुमहूं.......................
तोहरव बिचार घिनहे सांकर, औ कपट नीत मां दोहगर हा।
सिंघासन के पण्डन कस तुम भितरघात मा पोहगर हा॥
तुम दंदी फन्दी फउरेबी, औ चुगुलखोर के सांचा हा।
मुंह देखी भांषन गीत पढै मा, तुम चमचन के चाचा हा॥
चोर हया तुम कवियन अस, औ पत्रकार कस चापलूस।
अब तुमहूं त कुछ खूस, अब तुमहूं त कुछ खूस॥
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भारत देश महान्
भारत देस महान भाई जानै सकल जहान।
इतिहासन कै सोन चिरइया होइगै लहूलुहान॥
कृषि परधान देस मां भाई मनई मरै बिन दाना।
जनता काहीं मिलै न कुटकी,नेता खांय मखाना॥
भारत माता के क्वारा मां नदिया बहै हजार।
मरै पिआसन हेन कै जनता सुखि गै बपुरी तार॥
राजनीत हेन गाय रही ही मेंघ मल्हार कै तान ।
भारत देस...........................................................
हथकरघा का वरगा देथी रेशम नगरी दिल्ली।
फटी फतोही तइन के फारै करै मजाक निठल्ली॥
गरीब गुजर करै कथरिन मां लगाये ठेगरी टांका।
कली दार कुरथा नेतन का पहिरे मलमल ढांका॥
भारत माता के देहें मा धोतिया वहै पुरान।
भारत देस..........................................................
कोठी माही रहै इंडिया निगडउरे मां भारत।
कउन कलम से लिखिहा भाई उन्नत केर इबारत॥
रपड़ा तरसै बूंद बूंद जिलहन मां बरखै बदरी।
भारत देस हमारै आय रह्य का नहि आय बखरी॥
फाइल माही बना ठाढ है हितग्राही का मकान।
भारत देस........................................................
अस्पताल का हाल क पूंछा वहै बेजार ही आज।
मुंह मांगी रकम डांक्टर ल्याहै होइ तबै इलाज॥
नही ता पुन वाखर मालिक है ईश्वर अल्ला ईसा।
वा गरीब कै अलहिन आ ही ज्याखर छूंछ है खीसा॥
चीर घर मां मांटी गंधाथी जमराज महकैं लै प्रान।
भारत देस.............
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विद्या के मंदिर मां बरती हैं लछमीं कै बाती।
कइसा देस य साक्षर होइ सरस्वतिव सकुचातीं॥
संस्कार कै हाट लगी ही पै ही मंहग बजार।
यहौ सदी मां एकलव्य के पढै कै नहि आय तार॥
ठाढे म्वाल चरित्र बिकाथै शिक्षा केर दुकान।
भारत देश.........................................................
थानन माही बोर्ड लगे हें देश भक्ति जन सेवा''।
होन अबला की बड़मंसी लुटतीं निरदोषन के क्यावा॥
झूंठ मूंठ का गढै मुकदमा करैं बहस कै चोट।
जे हत्या कइ दे सत्य कै निकहा करिया कोट॥
जांघन जांघन लोकल गुंडा बागैं सीना तान।
भारत देस.............................
राम अउर रहिमान हें बंदी धरम चढा फाँसी मां।
कबौ अजोध्या मथुरा मां कहूं खूंन बहै काशी मां॥
धरम के नाम मां चंदा लइके भइ लइन आपन खीसा।
बकुला भगत पिअरिया ओढे़ पढै़ हनुमान चलीसा॥
लूट लइन देवी देउतन का उनहिन के जजमान।
भारत देश..........................................................
राष्ट् भांषा हेन बनी तमासा पाय रही ही त्रास।
रामायन की होरी बरतीं सिसकैं तुलसी दास॥
गांॅधी जी के लउलितियन कै देस मां चिंदी चिंदी होइगै।
बिना बिआही महतारी अस भांषा रानी हिन्दी होइगै॥
अजुअव तक ता बनैं न बोलत बउरा हिन्दुस्तान।
भारत देस महान्............................................
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गुरूबाबा
गुरूबाबा हें दिया ग्यान कै, औ विज्ञान त्रिवेनी आंय।
गोबिन्द तक पहुंचामै बाले, गुरूअय सहज नसेनी॥
गुरू ज्ञान के परम खजाना, औ गुरू करूणा के निधान हें।
ईं विद्या के बगिया मांही, भारत देस के महाप्रान हें॥
ज्ञान देंय मां नही भेद, को हिन्दू मुसलिम जैनी आय।
गुरूबाबा हें.............................
माता दीन्हिस सुंदर काया गुरू शिक्षा के संस्कार।
सभ्भ बनामै कांही गुरू जी, कीन्हिन शब्दन से सिंगार॥
भारत माही गुरू कै पदवी, गीता शबद रमैनी आय।
गुरूबाबा हें...................
गुरू शब्द कै शक्ति देथें, गुरूअय भाग्य विधाता।
निरच्छर का ब्रम्हाक्षर से, जोड़ जोड़ के नाता॥
गुरू अजोध्या के बशिष्ट, औ संदीपनी उज्जैनी आंय॥
गोबिन्द तक पहुंचामै बालेगुरूअय सहज नसेनी आंय॥
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उूपरबाला
गिनै रोज हर सांस फलाने,बही मां लेय उतार।
बड़ा हिसाबी है य उूपर बाला साहूकार ॥
कुछ दिन आबा संचता बहुरा दइ उराव का घाव।
बपुरा दुखिया दुक्ख के नेरे बइठ करै उपचार॥
जेतू सांसै लइके आयन ओतुन कमी परी।
अधिक ब्याज के लालच मां लइ आयन अउर उधार॥
चाहे जउन गइल से हींठा सब मरघट तक जातीं है।
धौं कउन गली मां हबै फलाने सरग नरक का दुआर॥
चंदा के मंदिर मां बइठे हें आसरिक पुजारी के।
दुनिया ठाढ ही जेखे आंगू दोउ हांथ पसार ॥
बड़ा हिसाबी है य उपर बाला साहूकार॥
चाहे जेखे भाग मां भइलो जउन जउन लिख देय।
धौं को दइस बिधाता काहीं य सगले अधिकार॥
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आजादी कै स्वर्ण जयंती
आजादी कै स्वर्ण जयंती टी बी मां अकबारन मां।
आजादी कै स्वर्ण जयंती दुपहर के अंघिआरन मां॥
हमरे देस मां स्वर्ण जयंती सुरसा अस मंहगाई कै।
वन्हा अस जे दल का बदलै वा दलबदलू भाईकै॥
आजादी कै स्वर्ण जयंती भै दिल्ली भोपाल मां ।
आजौ हरिया है गुलाम हेन गांॅवन के चउपाल मां॥
आजादी कै स्वर्ण जयंती पूंजी बाद कछारन मां।
आजादी कै स्वर्ण जयंती भै अलगू के बखरी मां।
सरकारी योजना बंधी हैं जेखे खूंटा सकरी मां॥
चमचागीरी अभिनंदन के गाये ठुमरी ददरी मां।
झूर झार जे खासा गरजै उजर उजर वा बदरी मां॥
लमही बाली मउसी रोबै पंच के अत्याचारन मां।
स्वर्ण जयंती बापू के भुंइ मां भै नाथू राम कै।
स्वर्ण जयंती जयललिता के साथ साथ सुखराम कै॥
स्वर्ण जयंती वोट के खातिर तुस्टी करण मुकाम कै॥
स्वर्ण जयंती रथ यात्रा औ नारा जै श्री राम कै॥
गांॅधी बाद समाज बाद लग बाये लबरी नारन मां।
आजादी कै स्वर्ण जयंती हमरे देस के कांव मां।
केसर मां कस्तूरी मांही कश्मीरी के घाव मां॥
महतारी जह अरथी ढोबै छाती पीटत गांव मां।
दिल्ली बइठ तमासा देखै श्री नगर बाव मां॥
स्वर्ण जयंती हिबै अमल्लक घाती के गद्दारन मां।
आजादी कै स्वर्ण जयंती कानूनी व्यापारिन कै।
चोर उचक्का डांकू लुच्चा गुंडा अत्याचारिन कै॥
आजादी कै स्वर्ण जयंती करफू गोली गारिन कै।
जे बिश्वकर्मा का पिअंय पसीना खूनी पूंजीधारिन कै॥
जे मजूर के खून से पउधा पालै गमला जारन मां।
आजौ हमरे देस के सैनिक पाकिस्तानी जेल मां।
लगथै दिल्ली भूल गै उनही छुआछुअल्ला खेल मां॥
हमरे हांथे कुछू न आबा वा शिमला के मेल मां।
औ उंइ आपन सउंज उतारथें सरदार पटेल मां॥
हमी गर्व है महावीर अब्दुल हमीद बलिदानिन मां।
जिधना हम गद्दारन कांही धरती मां गड़बा द्याबै।
जिधना मानसरोबर माही हम तिरंगा फहरा द्याबै॥
बोली हर हर महादेव कै बोलब रावल पिण्डी तक।
उधनै होई स्वर्ण जयंती संसद से पगडंडी तक॥
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा नीक लगी तब नारान मां।
आजादी कै स्वर्ण जयंती टीबी मां अखवारन मां॥
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भइलो चलें करामय जांच
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जब उंइ खाइन मिला न आरव। हर गंगे।
हमरे दारी झारव झारव ॥ हर गंगे।
कूटत रहें रोज उंइ लाटा। हर गंगे।
हमरे दारी लागैं डांटा ॥ हर गंगे।
पांच साल खुब किहिन तरक्की।हर गंगे।
बोर ठ्यसर औ लगिगै चक्की॥हर गंगे।
दिहिन न हमही ध्याला झंझी।हर गंगे।
अब हिसाब कै मांगै पंजी॥हर गंगे।
अब य ओसरी आय हमार।हर गंगे।
अब तुम सेंतै करत्या झार॥हर गंगे।
भयन संच मां जब हम पांच।हर गंगे।
भइलो चलें करामय जांच॥हर गंगे।
जादा तुम न करा कनून।हर गंगे।
चुहकैं द्या जनता का खूंन॥हर गंगे।
मुलुर मुलुर द्याखा चउआन।हर गंगे।
हम कूदी तुम ल्या बइठान॥हर गंगे।
होइगे भइलो सत्तर साल।हर गंगे।
हमूं बनाउब ढर्रा ताल॥हर गंगे।
जब आंगना मां होइगै नाच।हर गंगे।
त भइलो चलें करमय जांच॥हर गंगे।
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आजादी से अजुअव तक वइसै फटी ही कथरी।
भारत देस हमारै आय रहय का नहि आय बखरी। ।
देखा एक नजर जनतै पुन देखा आपन ठाठ।
दस दस मोटर तोहरे दुअरा हमरे टुटही खाट। ।
कब तक हम अपना का ढोई लहकै लाग है कन्धा।
तुहिन बताबा राजनीत अब सेवा आय कि धन्धा। ।
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नल तरंग 'बजाउथें
'नल तरंग 'बजाउथें बजबइया झांझ के।
देस भक्ति चढ़ा थी फलाने का साँझ के। ।
''वीर पदमधर ''का य पीढ़ी नही जानै
ओखे बस्ता म हें किस्सा हीर राँझ के।।
पूंछी अपना बपुरी से कि कइसा जी रही
जेही कोऊ गारी दइस होय बाँझ के। ।
उनही ईमानदार कै उपाधि दीन गै
जे आँधर बैल बेंच दइन काजर आंज के। ।
हंस य कवित्त भर से काम न चली
चरित्त का चमकाबा पहिले माँज माँज के। ।
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आबा हो लछमी
आबा हो लछमी आबा साथै गनेश के।
स्वागत म देस ठाढ़ है दियना लेस के। ।
मुड़हर से ओसारी तक बड़की सजाये घर का।
स्वस्तिक औ रंगोली से गोदना गोदये फरका। ।
डेहरी सुदिन निकारे तोहरे गृह प्रवेश के।
आबा हो -लछमी ------------
दुअरा म बँधनबार औ शुभ लाभ भीत म।
गोबर से महकै माटी जस लोक गीत म। ।
अगमानू म अजोर थिरकेँ भेष भेष के।
आबा हो लछमी ------------
जब से 'भृगु जी 'मारिन श्री हरि का लातें।
तब से दलिद्रता कै अंधियारी कारी रातें। ।
भारत कै सगली माया लई गें विदेश के।
आबा हो लछमी आबा ----------
गाँवव म अहिरा बाबा का भारी हूंन ही।
होती हैं गऊ कै हत्या सब सार सून ही। ।
मुरइला का छाहुर रोय गा बिन गाय भैस के।
आबा हो लछ्मी आबा साथै गनेस के। ।
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हिन्दी
वीर कै गाँथा लगी जो रचैं औ 'जगनिक 'के आल्हा का गायगै हिन्दी।
कब्बौ बनी 'भूखन 'कै बानी त वीरन का पानी चढ़ाय गै हिन्दी। ।
हाथे परी 'सतसय्या 'के ता वा 'सागर मा गागर 'भराय गै हिन्दी।
बुढ़की लगाइस 'सूर 'के सागर ता ममता मया मा नहाय गै हिन्दी। ।
'रसखान 'के क्वामर क्वामर छन्द औ मीरा के पद काही ढार गै हिन्दी।
भक्ति के रंग मा लागी रंगै तब भाषा लोलार पिआर भै हिन्दी। ।
बीजक साखी कबीर के व्यंग्य पाखण्डिन का फटकार गै हिन्दी।
औ मासियानी मा तुलसी के आई ता 'मानस 'अगम दहार भै हिन्दी। ।
हिंठै लगी जब 'पंत 'के गाँव ता केत्ती लगै सुकुमार य हिन्दी।
हरिचंद ,महावीर ,हजारी ,के त्याग से पुष्ट बनी दिढ़वार य हिन्दी। ।
निराला ,नागार्जुन ,के लेखनी मा भै पीरा कै भ्याटकमार य हिन्दी।
रात जगी जब ''मुंशी ''के साथ ता हरिया का भै भिनसार य हिन्दी। ।
भारत माता के कण्ठ कै कण्ठी औ देस कै भाषा लोलार हिन्दी।
लोक कै बोली औ भाषा सकेल के लागै विंध्य पहार य हिन्दी। ।
छंद ,निबंध ,कहानी,औ कविता से लागै सुआसिन नार य हिन्दी।
अपने नबऊ रस औ गण शक्ति से कीन्हिस सोरहव सिगार य हिन्दी। ।
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पावस कै रित आई
रिम झिम रिम झिम मेघा बरखै , थिरकि रही पुरवाई।
धरती ओडिस हरियर चुनरी पावस कै रित आई। ।
भरे दबादब ताल तलैया कहूँ चढ़ी ही बाढ़।
एकव वात न लेय किसनमा जब से लगा असाढ़। ।
बोबै बिदाहै रोंपै नीदै करै नीक खेतवाई। ।
भउजी बइठे कजरी गौती भाई आल्हा बाँचै।
टिहुनी भर ब्वदा मा गाँवन की चौपालै नाचैं। ।
करै पपीहा गोइड़हरे मा स्वाती केर तकाई। ।
रिम झिम रिम झिम मेघा बरखै थिरकि रही पुरवाई। ।
गऊ चरनी सब जोतर गईं ही रखड़उनी मा बखरी।
धधी सार मा गइया रोमै खूब बमाती बपुरी। ।
''मैया धेनु चरामै जइहव ''मचले किशन कन्हाई।
रिम झिम रिम झिम मेघा बरखै थिरकि रही पुरवाई। ।
चउगानन का अतिक्रमन लील गा लगी गली मा बारी।
मुड़हर तक जब पानी भरिगा रोमै लाग ओसारी। ।
हंस कहिन की खूब फली सरपंचन केर मिताई।
रिम झिम रिम झिम मेघा बरखै थिरकि रही पुरवाई। ।
चुअय लाग छत स्कूलन कै दइव बजाबै ढोल।
एक दउगरै मा लागत कै खुल गै सगली पोल। ।
विदया के मंदिर मा टोरबा भींजत करैं पढ़ाई।
रिम झिम रिम झिम मेघा बरखै थिरकि रही पुरवाई। ।
जब उई पउलै लगें मेंड़ त ख्यात का लगिगा सदमा।
दोउ परोसी लपटें झपटें हिंठै लाग मुकदमा। ।
सर सेवाद ता कुछू न निकला करिन वकील लुटाई।
रिम झिम रिम झिम मेघा बरखै थिरकि रही पुरवाई।
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आजादी कै स्वर्ण जयंती
आजादी कै स्वर्ण जयंती टीबी मा अकबारन मा।
आजादी कै स्वर्ण जयंती दुपहर के अधिआरन मा।।
हमरे देस मा स्वर्ण जयंती सुरसा अस महंगाई कै।
वढना अस जे दल का बदलै वा दल बदलू भाई कै।।
आजादी कै स्वर्ण जयंती ही दिल्ली भोपाल मा।
आजौ हरिआ है गुलाम हेन गांवन के चउपाल मा।।
आजादी कै स्वर्ण जयंती पूंजीवाद कछारन मा।
आजादी कै स्वर्ण जयंती टीबी मा अकबारन मा।।
आजादी कै स्वर्ण जयंती ही अलगू के बखरी मा।
सरकारी योजना बधी है जेखे खूंटा सकरी मा।।
चमचागीरी अभिनंदन के गाये ठुमरी ददरी मा।
झूरझार जे खासा गरजै उजर उजर वा बदरी मा।
लमही बाली मउसी रोबै पंच के अत्याचारन मा।
आजादी कै स्वर्ण जयंती टीबी मा अकबारन मा।।
स्वर्ण जयंती बापू के भुंइ मा ही नाथूराम कै।
स्वर्ण जयंती जयललिता के साथ साथ सुखराम कै।।
स्वर्ण जयंती बोट के खातिर तुष्टीकरण मुकाम कै।।
स्वर्ण जयंती सिद्धांतन के कुर्सी निता लिलाम कै।।
गांधीवाद समाज वाद लगबाये लबरी नारन मा।
आजादी कै स्वर्ण जयंती टीबी मा अकबारन मा।।
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गोस्वामी तुलसी दास
हे तुलसी हुलसी नंदन पूज्यपाद श्री संत।
हे भारतीय संस्कृति के रक्षक चिरनवीन अनंत। ।
धन्य धरा वह राजा पर की बहती जहां कालिंदी।
धन्य प्रेरणा रत्नावलि की महिमा मंडित हिंदी। ।
धन्य कलम जिसने दिये मानस से सद्ग्रन्थ।
जो सदाचार मर्यादा का बतलाते नित पंथ। ।
जिसके पठन से आत्म शांति होती अनुभूति तुरंत।
हे तुलसी हुलसी नंदन पूज्यपाद श्री संत।।
शैव शाक्त औ वैष्णव जन को एक सूत्र में बांधा।
मुक्तक से मानव मुक्ति की दूर करी है बाधा। ।
लौकिक सगुणोपासक बन कर अलौकिक दिया प्रकाश।
शत शत बंदन अभिनन्दन गोस्वामी तुलसी दास। ।
सहज समन्वय कारी पंथ केरहे जीवन पर्यन्त।
हे तुलसी हुलसी नंदन पूज्यपाद श्री संत।।
गंगोत्री के पावन जल से जलाभिषेक कर रमेश्वरम् का।
ईश भक्ति में राष्ट्र भक्ति का देश प्रेम भारतीय धरम का। ।
रामचरित मानस के जैसा कर्तव्य बोध शोध उत्कर्ष।
विश्व के किसी ग्रन्थ में ढूढे मिलेगा यह न पुनीत आदर्श। ।
सात समंदर पार भी शाश्वत सनातन है अटल वंत।
हे तुलसी हुलसी नंदन पूज्यपाद श्री संत।।
हे भाषा के अमर भाष्कर किया राष्ट्र भाषा उत्थान।
स्वयं विनायकऔ माँ वाणी गाते जिसका यशो गान। ।
चित्रकूट की तपो भूमि के हे तपस्वी संत महान।
महा प्रलय तक ऋणी रहेंगे हिन्दू हिंदी हिन्दुस्थान। ।
जनम महोत्स्व मना रहा है आज भारतीयता का संत।
हे तुलसी हुलसी नंदन पूज्यपाद श्री संत।।
सिरि बानी बन्दना
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हे मातु शारदे संबल दे तै निरबल छिनीमनंगा का।
मोरे देस कै शान बढै औ बाढै मान तिरंगा का॥
दिन दिन दूना होय देस मां लोकतंत्र मजबूत।
घर घर विदुषी बिटिया हों औ,लड़िका होंय सपूत॥
विद्वानन कै सभा सजै औ पतन होय हेन नंगा का।
मोरे देस कै शान बढै औ बाढै मान तिरंगा का॥
बसुधैव कुटुंम्बं' केर भामना बसी रहै सब के मन मां।
औ परबस्ती कै लउलितिया, रहै कामना जन जन मां ॥
देस प्रेम कै जोत जलै, कहूं मिलै ठउर न दंगा॥
मोरे देस.........................
खेलै पढै बढैं बिद्यार्थी, रोजी मिलै जमानन का।
रोटी औ सम्मान मिलै, हेन घर घर बूढ़ सयानन का॥
रामेश्वरं मां चढत रहै जल, गंगोतरी के गंगा का।
मोरे देस कै ......................
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मैहर धाम
मइहर है जहां विद्या कै देवी, विराजी माँ शारद शक्ति भवानी।
पहिलय पूजा करय नित आल्हा,औ देवी के वर से बना वरदानी॥
मइहर है जहा लिलजी के तट , मठ मह शिव हें औधड.दानी॥
ओइला मां मन केर कोइला हो उज्जर,लंठव ज्ञानी बनै विज्ञानी।
मइहर है जहा संगम है , सुर सरगम कै झंकार सुहानी॥
अइसा पुनीत य मइहर धाम कै, शत शत वंदन चंदन पानी॥
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वाणी वंदना
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वर दे वीणापाणि हंसवाहिनी वागीश माँ ,मेरे देश को तु सुख शान्ति समृद्धि दे।
राग द्वेष के कलेष लेश मात्र भी न रहें ,जन जन में जान्हवी सी शुचि धार बुद्धि दे। ।
सब में हो सर्व धर्म सदभाव भावना ,सत्य शौर्य धैर्य बल विवेक की तू वृद्धि दे।
दे दे शारदे अम्ब अविलम्ब अवलंब,भारत में भर्ती माँ ऋत ऋद्धि सिद्धि दे। ।।
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बिटिया
ठुम्मुक ठुम्मुक जाथी इस्कूलै ड्रेस पहिर के बइया रे।
टाँगे बस्ता पोथी पत्रा बिटिया बनी पढ़इया रे। ।
खेलै चन्दा, लगड़ी, गिप्पी, गोटी, पुत्ता -पुत्ती ।
छीन भर मा मनुहाय जाय औ छिन भर माही कुट्टी। ।
बिट्टी लल्ला का खिसबाबै ''लोल बटाइया रे''। ।
ठउर लगाबै अउजै परसै करै चार ठे त्वारा।
कहू चढ़ी बब्बा के कइयां कहु अम्मा के क्वारा। ।
जब रिसाय ता पापा दाकै पकड़ झोठइया रे।
बिन बिटिया के अंगना अनमन घर बे सुर कै बंसी।
बिटिया दुइ दुइ कुल कै होतीं मरजादा बड़मंसी। ।
हमरे टोरिअन काही खाये जा थै दइया रे।
भले नही भइ भये मा स्वाहर पै न माना अभारु।
लड़िका से ही ज्यादा बिटिया ममता भरी मयारू। ।
पढ़ी लिखी ता बन जई टोरिया खुदै सहय्याँ रे।
कन्यन कै होइ रही ही हत्या बिगड़ि रहा अनुपात।
यहै पतन जो रही 'हंस ' ता कइसा सजी बरात। ।
मुरही कोख से टेर लगाबै बचा ले मइया रे। ।
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चली करैं मतदान
चला भैय्या मतदान केन्द्र हो चली करैं मतदान।
अपने बोट दिहे ते होई लोकतंत्र बलमान। ।
हम अब्बल लोकतंत्र दुनिया के मानि रहा संसार।
जनता का जनता के खातिर चला चुनी सरकार। ।
बोटहाई के दिना करी मतदान केन्द्र प्रस्थान।
चला भैय्या मतदान केन्द्र --------------------------
कोऊ बांकी बची न अपना डारी सब जन बोट।
अपने मन के प्रत्याशी का खुदै चढ़ाई रोट। ।
बिन दबाव लालच के भाई मन का चुनी निशान।
चला भैय्या मतदान केन्द्र -------------------------------
चला करी संकल्प बंधी सब एकय साहुत सूत।
सबसे जादा बोट डराउब अपने अपने बूथ। ।
गांव गांव औ नगर नगर का बोलय हिन्दुस्तान।
चला भैय्या मतदान केन्द्र------------------------------------
हे मतदाता भाई बहिनी दाऊ काकी कक्का।
अरथुत के मतदान करी अपना अरगासी सबका।
अपना के मतदान मा धड़कै लोकतंत्र कै जान।
चला भैय्या मतदान केन्द्र हो चली करैं मतदान। ।
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नकटी कहां से आय गै
तुलसी के बगिया मा नकटी कहां से आय गै।
यतना पचामै कै शक्ती कहाँ से आय गै । ।
जे काल्ह तक धरम का अफीम बताउत रहें
वा कुपोषित बिचार मा भक्ती कहां से आय गै। ।
उइ कहा थें काबू मा आतंकबाद है
फउजी कै हमरे गांव मा तख्ती कहाँ से आय गै। ।
दुनिया मा पंचशील का खुब राग अलापा गा
ता खून सनी खबर कै रक्ती कहां से आय गै। ।
असमय ता दसमी केर वा परिच्छा दिहिसी
हाथे मा लगनपत्री लये अकती कहां से आय गै। ।
कबहुं आर्य द्रबिन कबौ मूल निबासी
समाज टोरय बाली बिभक्ती कहां से आय गै। ।
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अपना के हींसा मा
अब ता सगले पुन्न धरें अपना के हींसा मा।
तउ लजाते हयन देख मुँह आपन सीसा मा। ।
को फुर कहै बताबै भाई देस के जनता से
जबकी हेन उइ मगन हेमै सत्ता के चालीसा मा। ।
उइ पाखण्डी देस के सूरज काही जुगनू लिख दीन्हिन
लबरी पोदी बाला वा इतिहास है हमरे हीसा मा। ।
सिये सिये अस ओंठ हे भइय्या अमरित परब आजादी के
लागै जइसा आंखर- आंखर बंद हो बपुरे मीसा मा। ।
सागर कै अउकात नहीं पै नरबा खुब अभुआय लगे
हंस कहा थें उइ अगस्त का बंद है हमरे खीसा मा। ।
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आबा बिकास का गड़बा देखाई थे
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आबा बिकास का गड़बा देखाई थे।
वमै डबरा योजना का पड़बा दिखाई थे।।
जउन किसानन कै आमदानी भै दूगुन
ओखे मड़इया के खड़बा देखाई थे। ।
जउन खाद बीज खितिर गहन धरा है
वा किसानिन कै झुमकी औ छड़बा देखाई थे। ।
मध्ध्यान भोजन का सेबाद बड़ा गुरतुर है
अपना का इस्कूल के भड़बा हम देखाई थे। ।
भमरी जब परिगय ता वा बजगीर साथ भागि गय
हम वा उढ़री राजनीत का मड़बा देखाई थे। ।
हंस के बगिया मा लिपटिस कै राज ही
मुरझान परा आमा का हम कड़बा देखाई थे। ।
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साहित्त फुर कहा थै
साहित्त फुर कहा थै लबरी नही कहै।
अपना के सत्ता अस जबरी नही कहै। ।
साहित्त के नस मा दुष्यंत केर मस है ,
साहित्त खउटही का कबरी नहीं कहै। ।
''राम'' के दरबार तक वाखर धाक ही ,
पै कबहू अपने मुंह से ''शबरी''नही कहै। ।
उई घायल से पूंछा थें कि कइसा लगा थै
अस्पताल पहुचामै का खबरी नहीं कहै। ।
रूपियन के निता कबहू कविता नही लिखै
हंस काही कोउ दुइ नम्बरी नहीं कहै। ।
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शहीदन कै वंदना
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धन्न धन्न सौ बेर धन्न य देस कै पावन माटी।
हमरे पुरखन का प्रताप औ भारत कै परिपाटी। ।
कहय लाग भारत माता धन्न बहिनी डोर कलाई का।
जे सीमा मा संगीन लये दइन जीवन देस भलाई का। ।
धन्न कोख महतारी कै जे पूत दान दइन मूठी मा।
मातृभूमि के देस प्रेम का दूध पिआइन घूंटी मा। ।
धन्न धन्न वा छाती का जेहि एकव है संताप नही।
बलिदान पूत भा देस निता धन्न धन्न वा बाप कही। ।
धन्न धन्न वा येगुर काहीं वा सेंदुर कै मांग धन्न।
ज्याखर भा अहिवात अमर वा नारी केर सोहाग धन्न। ।
उई भाईन कै बांह धन्न मारिन सुबाहु मरीची अस।
बइरी वृत्तासुर मरै का जे बन गें वज्र दधीची अस। ।
औ अपने अपने रक्तन से वन्दे मातरम उरेह दइन.।
जब भारत माता मागिस ता उई हँसत निछावर देह दइन। ।
बोली हर हर महादेव कै बोल ऊचें सरहद्दी मा।
औ बैरिन का मार भगाइन खेलै खेल कबड्डी मा। ।
धन्न उई अमर जबानन का जेहिं कप्फन मिला तिरंगा का।
जब राख फूल पहुंची प्रयाग ता झूम उचा मन गंगा का। ।
ताल भैरवी देश राग तब गूंजी घाटी घाटी।
धन्न धन्न सौ बेर धन्न या देस कै पावन माटी। ।
गरजै लगे सफ़ेद शेर औ बांधव गढ़ के हिरना।
फूली नही समतीं बीहर औ केवटी के झिरना। ।
बीर सपूतन के उरांव मा डुबी गइया बछिया।
बीर पदमधर के बलिदानव का खुब सुमिरै बिछिया। ।
बीर विंध्य कै सुनै कहानी नानी मुन्ना मुन्नी।
गद्गद होइ गें चित्रकूट औ धार कुड़ी पयसुन्नी।।
अमरकंटक मा बिह्वल रेवा सुन के अमर कहानी।
विंध पूत सीमा मा जाके बने अमर बलिदानी। ।
कलकल करत चली पछिम का दुश्मन कई दहाड़ी।
सीना तानै'' नरो'' ''पनपथा'' औ" कैमोर' पहाड़ी। ।
तबहिंन हिन्द महा सागर मा बड़ बडबानाल धंधका।
दुश्मन के भें ढ़ील सटन्ना हिन्दू कुश तक दंदका। ।
गोपद बनास टठिया साजै औ सोन करै पूजा पाती।
औ रेवा खुद धन्न होइ गई कइ के उनखर सँझबाती। ।
हे !उनखे तरबा का धूधुर हमरे लिलार का चन्दन बन।
ओ कवि !तहू दे खून कुछू तबहिन होइ उनखर वंदन। ।
देस भक्ति जनसेवा बाली ही जिनखर परिपाटी।
धन्न धन्न सौ बेर धन्न या देश कै पावन माटी। ।
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अटलबिहारी
भारत माता भय दुखियारी खो के अटलबिहारी का।
जुग गाई उनखर गुन गाँथा थाती धरे चिन्हारी का। ।
जब जब नेतन कै बात चली ता भारत माता यहै कही
देखा अपने अंतस का पून देखा अटलबिहारी का। ।
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**हे जुग नायक अटलबिहारी **
हे जुग नायक अटलबिहारी।
अपना का य देस आभारी। ।
हिरदय राज किहिन जन जन के।
रहे कबीर अस सबके मन के। ।
को है यतर बड़ा बेउहारी।
हे जुग --------------------
भारत के अनमोल रतन उइ।
अपने आप मा एक बतन उइ। ।
सबके मंगल अउ उपकारी।
हे जुग ----------------------
लोकतंत्र के अटल हिमालय।
साहुत के इस्लोक शिवालय। ।
भारत रतन हे अटलबिहारी।
हे जुग ---------------------
लोकतंत्र के उइ चरित्र अस।
सबके हितुआ रहे मिंत्र अस। ।
तानाशाही का बनबारी।
हे जुग नायक अटलबिहारी। ।
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आपन बोली
महतारी अस लगै मयारू घूंटी साथ पिआई।
आपन बोली बानी लागय मानस कै चौपाई।।
भांसा केर जबर है रकबा बहुत बड़ा संसार।
पै अपने बोली बानी कै अंतस तक ही मार।।
काने माही झनक परै जब बोली कै कबिताई।
आपन बोली बानी लागय मानस कै चौपाई।।
समझैं आपन बोली बानी बोकरी भंइसी गइया।
नीक लगै जब लोक गीत अस गाबै कहूं गबइया।।
अपने बोली मा कोल दहकी लोरी टिप्पा राई।
आपन बोली बानी लागय मानस कै चौपाई।।
महकै अपने बोली माही गांव गली कै माटी।
आपन बोली महतारी के हांथ कै परसी टाठी।।
अपने बोली मा गोहरामै घर मा बब्बा दाई।
आपन बोली बानी लागय मानस कै चौपाई।।
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बिटिआ कै बसकट (जन्मदिन)
बड़े सकारे बिटिआ बोली बड़े उराव भरे।
पापाऽ आजु मोर बसकट ही हरबी अया घरे।।
हम न कहब कि तुम लइ आन्या हमी मिठाई केक।
घर मा सब जन बड़े प्रेम से खाब अंगाकर सेक।।
झोरा माही दस रुपया कै लइया लया धरे।
बचै केराया से जो पइसा लीन्हया एक कलम।
ज्यमा उरेहब अच्छर अच्छर सीखब लिखय करम।।
पढ़ब लिखब ता देखि लिहा पुन दिन अपनिव बहुरे।।
मोहि न चाही नये नये ओन्हा येतु करया बंधेज।
रक्छा होय मोरे बचपन कै औ पढि सकउ कलेज।।
सुसुकि सुसुकि के रोबैं लागी दोऊ तरइना भरे।
पापा आज मोर बसकट ही हरबी अया घरे।।
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गरीब केर ठंडी
गरीब केर ठंडी गरीब केर ठंडी।
बांध्य का देहे गतिया पहिरै का फटही बंडी। ।
सथरी बिछी ता लागय डनलप का गुलगुल गद्दा।
पउढ़य घरे भरे के भाई बहिन अउ दद्दा। ।
आबा थी निकही निदिआ बे गोली बे बरंडी।
दिन उअतै घाम तापै चउरा मा मारे पलथी।
बिटिआ लाग रांधै नए चाउर कै गोलहती। ।
चुल्हबा मा आंच देथी धंधोल बिनिआ कंडी।
दुई होय कि रुई होय कहि के मुस्की मारै भउजी।
कापा थें तन के हाड़ा जाड़ा किहे मन मउजी। ।
तउअव गरीबी खुश ही जस जुद्ध मा शिखंडी।
करजा का खाब है अउ पयार केर तापब।
ओन्हा नहीं अलबुद्दा जाड़े मा थरथर काँपब। ।
गरीबी कै नामूजी जाड़ा करइ घमण्डी। ।
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टोरिया कहा है
बारजा बचा है ओरिआ कहाँ ही।
पिल्वांदा के दूध कै खोरिआ कहाँ ही।।
राशन कार्ड हलाबत तिजिया चली गै
कोटा बाली चीनी कै बोरिआ कहाँ ही।।
आजादी के अश्व मेध कै भभूत बची ही
गांधी के लोकतंत्र कै अजोरिआ कहाँ ही।।
वा प्रदूषण कै पनही पहिरे मुड़हर मा चला गा
घर गाँव के अदब कै ओसरिआ कहाँ ही।।
नोकरी लगबामैं का कहि के लइ गया तै
वा गरीब कै बड़मंसी टोरिआ कहाँ ही।।
सार अबाही खूंटा ग्यरमा औ अम्मा का पहिलय सुर
कामधेनु कै पामर वा कलोरिआ कहाँ ही।।
घर के सुख संच कै जे जपत रहें माला
वा पिता जी कै लाल लाल झोरिआ कहाँ ही।।
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मजूर [बघेली कविता ]
हम मजूर बनिहार बरेदी आह्यन लेबर लगुआ।
करी मशक्क़त तनमन से हम गरमी जाड़े कदुआ। ।
माघ पूस कै ठाही हो चह नव तपा कै दुपहरिया।
सामान भादौ के कादौ मा बे पनही बे छतरिया। ।
मिलब कहू हम पाथर फोरत करत कहू हरवाही।
खटत खेत खरिहान खान म काहू ताके पाही। ।
हम कहू का काम निकारी औ काहू के बंधुआ।
''कर्म प्रधान विश्व करी राखा ''कहि गें तुलसी दास।
कर्म देव के हम विश्कर्मा देस मा पाई त्रास। ।
शोषक चुसि रहे हे हमही अमर बेल की नाइ।
अउर चुहुकि के करै फराके गन्ना चीहुल घाई। ।
दुधिआ दातन मा बुढ़ाय गा हमरे गाँव का गगुआ।
हम पसीना से देस का सीच्यन हमरै किस्मत सूखी।
देस कोष मा भरयन लक्ष्मी घर कै लक्ष्मी भूखी। ।
घूंट घूँट अपमान पिअत हम गढ़ी प्रगति कै सीढ़ी।
मन तक गहन है बेउहर के हेन रिन मा चढ़ गयीं पीढ़ी। ।
फूका परा है हमरे घर मा तउ हम गाई फगुआ। ।
हम मजूर ------------
हमिन बनायन लालकिला खजुराहो ताज महल।
हमिन बनायन दमदम पालम सुघर जिहाज महल। ।
हमहिंन बाँध्यन नदिया नरबा तलबा अउर तलइया।
हमिन बनायन धमनी चिमनी लखनऊ भूल भुलइया। ।
हम सिसकत सीत ओसरिया माहीं धइ के सोई तरुआ।
कहै क त गंगा जल अस है पबरित हमार पसीना।
तउ ''कर्मनाशा ''अस तन है पीरा पाले सीना।।
बड़े लगन से देश बनाई मेहनत करी आकूत।
मेहनत आय गीता रामायन हम हन तउ अछूत। ।
छुआछूत का हइया दाबे देस समाज का टेटुआ।
हम मजूर ---
बिन खाये के गंडाही का है छप्पन जेउनार।
कनबहिरे भोपाल औ दिल्ली को अब सुनै गोहर। ।
जब जब माग्यन उचित मजूरी तब तब निथरा खून।
पूंजी पति के पॉय तरी है देस का श्रम कानून। ।
न्याय मांगे मा काल्ह मारे गें दत्ता नियोगी रघुआ।
हम मजूर ---------------------------------
भले ठेस ठेठा कराह से हाँकी आपन अटाला।
पै हम करब न घात देस मा भ्रष्टाचार घोटाला। ।
जे खून पसीना अउंट के माड़ै रोटी केर पिसान।
हमी उराव है अइसन माई बाप कै हम संतान। ।
हमरे कुल मा पइदा नहि होंय डाकू गुंडा ठगुआ।
हम मजूर बनिहार बरेदी आह्यन लेबर लगुआ। ।
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फलनिया
जबसे तोहका दिख्यन फलनिया भाजी खोटत खेत मा।
तब से धकपक करय करेजबा औ मन नहि आय चेत मा।।
महकैं लाग मेड़ पगडंडी गुलमेंहदी औ रेउजा।
चंचल मन का धौं काहे य हिदय लेय उपरउझा।।
रामौ सत्त कही हम तोहसे खोट न कउनौ नेत मा।
पहिल दउगरा के भुंइ घांई गमकै उनखर देह।
उपरंगी उंई पीसैं दांत पै भितर गुल्ल है नेह।।
मारे लाज के लाल गाल जस पहिलय चुम्मा लेत मा।
वा गसान कै मेड़ फलनिया लागै बड़ी उरायल।
बइर खात मा जहा गिरी तै छमछम बाजत पायल।।
सामर मुंहिआ अइसा लागै जइसा धान गलेथ मा।
बोली लगय तोहार फलनिया लोकगीत अस मीठ।
सहजभोर छोहगर य रूप मा लग न जाय कहुं डींठ।।
बड़ी पिआर लगा तू हमका हमरै ओरहन देत मा।
जब से तोहका दिख्यन फलनिया भाजी खोटत खेत मा।।
अबहूं नही व बिसरै घटबा दउरी धोमन चाउर।।
अउ मूडे़ का जूड़ा लागै जइसा खेत मा छाहुर।।।
घटै बढ़ै धड़कन का रकबा तापमान जस रेत मा।
जब से तोहका दिख्यन फलनिया भाजी खोटत खेत मा।।
लगै गाल का तिला फलनिया जइसा होय डिठउरा।
पै चम्पा के फूल के नियरे हिरकै कबौं न भउरा।।
काहू के नैनन का दोहपन लग न जाय कहुं सेंत मा।
जब से तोहका दिख्यन फलनिया भाजी खोटत खेत मा।।
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ओही दिहा न वोट
बिना धनीधोरी का है हेन निरधन अउर गरीब।
चाहे ज्याखर राज होय पै बदला नही नसीब।।
झउआ भर चलि रहीं योजना पै ओखे कउन लेखा मा।
गरीबन का है नाव नही पबित्र गरीबी रेखा मा।।
चह जउन जात हो गरीब पै सब कै समिस्या एक ही।
सबके आँसू अंतस पीरा केर तपिस्या एक ही।।
राजनीत सब दिन चाटिस ही पूंजीपति के तरबा।
औ गरीब के घर का लाइस अपनेन 🏡 का क्वरबा।।
राजनीत का लखा कपट छल की ही केत्ती सूध।
हमरे घर मा दारू बांट्य अपने घर मा दूध।।
पी पी दूध भै राजनीत य द्याखा केत्ती मोट।
हंस कहैं जे दारू बांट्य ओही दिहा न बोट।।
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जब से य मन मोहित होइगा
जब से य मन मोहित होइगा, तोहरे निरछल रूप मां।
एकव अंतर नही जनातै, चलनी मां औ सूप मां॥
रात रात भर लिहन कराउंटा, नीद न आई आंखिन का।
औ मन बाउर बइकल बागै, ओ ! गोरी तोरे उूब मां॥
सनकिन सनकी बातैं होइ गईं, लखे न पाइस पलकौ तक।
मन निकार के उंइ धइ दीन्हिन हमरे दोनिया दूब मां॥
ओंठ पिआसे से न कउनौं,=एक आंखर पनघट बोलिस।
पता नही धौं केतू वाठर, निकराथें नलकूप मां॥
सातक्षात् तुम पे्रम कै मुरत, होइ के निठमोहिल न बना।
द्याखा केतू करूना होथी, ईंटा के स्तूप' मां॥
जब से फुरा जमोखी होइगै, तन औ मन के ओरहन कै,
तब से फलाने महकै लागें, जइसा मंदिर धूप मां॥
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🙅🙅तै लगते इन्दौर फलनिया 💁💁
हम सामर तैं गोर फलनिया।
बड़ी मयारू मोर फलनिया। ।
जीवन के ताना -बाना कै ।
तैं सूजी हम डोर फलनिया। ।
हम रतिया भादव महिना कै ।
तैं फागुन कै भोर फलनिया। ।
रिम झिम रिम झिम प्रेम के रित मा ।
तैं मेघा हम मोर फलनिया। ।
हम हन बिंध अस उबड़ खाबड़ ।
तैं लगते इन्दौर फलनिया। ।
हिरदय भा कोहबर अस बाती ।
जब हंस से भा गठजोर फलनिया। ।
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धांधे जइहा
काल्ह तुहूं ता धांधे जइहा।
हीठत जइहा कांधे अइहा।।
ब्रिंदाबन मा रहय का है ता
तुमहूं राधे -- राधे गइहा । ।
भ्रसटन मा हम बिस्व गुरु हन
कबहुं ता आराधे जइहा। ।
छापा परा ता निकली गड्डी
अब ता भइलो बांधे जइहा। ।
पूर सभा गंधाय लाग ही
आखिर कब तक पादे जइहै। ।
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दरबारन मा चरचा है
दरबारन मा चरचा ही कम्प्यूटर इंटरनेट के ।
खरिहानन मा मरै किसनमा फंदा गरे लपेट के। ।
केत्तव निकहा बीज होय पै पनपै नहीं छह्याला मा।
उनही दइ द्या ठयाव सुरिज का दउरैं न सरसेट के। ।
करब टंटपाली अउ टोरइली कब का उइ ता भुलि चुकें
बपुरे ध्रुब प्रहलाद हें दूरी पोथी अउर सलेट के। ।
अइसा घिनही आँधी आई बिथरि गा सब भाई चारा।
पुरखा जेही बड़े जतन से सउपिन रहा सहेज के। ।
मंदिर मसजिद से समाज के मिल्लस कै न आस करा
धरम के ठेकेदारन का ई आही साधन पेट के। ।
प्रेमचंद के होरी का उइ उगरी धरे बताऊथें
द्याखा भइलो ताज महल औ चित्र इंडिया गेट के। ।
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कउआ बइठ है
जब से मूड़े मा कउआ बइठ है।
अशगुन लये बऊआ बइठ है। ।
पी यम आवास कै क़िस्त मिली ही
वा खीसा मा डारे पउआ बइठ है। ।
पर साल चार थे दाना नहीं भा
औ सेंदुर रुपया लये नउआ बइठ है। ।
छै महिना से मजूरी नहीं मिली
वा कखरी मा दाबे झउआ बइठ है। ।
उइ कहा थें देस भ्रष्टाचार मुक्त है
कुर्सी मा जहां देखा तहां खउआ बइठ है। ।
गरीबी से बोलिआय का अंदाज अलग है
उई हंस का बताउथे भतखउआ बइठ है। ।
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रोटी कै बात कर
अब रोज़ी कै बात कर रोटी कै बात कर।
गरीब हें निपर्दा लगोटी कै बात कर। ।
त्राहि त्राहि मची ही पानी कै देस मा
नाहक बहैं न पाबै टोंटी कै बात कर। ।
मुँह मा भरे बिक्ख भले 'नीलकण्ठ 'बन
समाज माही शीला सपोटी कै बात कर। ।
चाहे भले कल्लात है पै कुतकुती तो ही
भउजाई केर चींथी चिकोटी कै बात कर। ।
जे आने का गडबा खनिस ता खुद सकाय गा
अच्छाई हेर निन्दा न खोटी कै बात कर। ।
बिलार के गरे मा घंटी अब न बांध हँस
पिंजरा म बंद मिठठू चित्रकोटी कै बात क़र। ।
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चढ़ी ही धन्ना सेठी भाई
पकडे रहा मुरेठी भाई।
चढ़ी ही धन्ना सेठी भाई।।
आन के बहिनी बिटिया कही
उइं मारा थें सेटी भाई। ।
जो जोरई कै दबा न डरिहा
सब खा ल्या है घेटी भाई। ।
नेता हार लगाबै ल्याखा
को को लइ गा पेटी भाई। ।
खूब किहिन् मस्ती कलेज मा
आय गें एटी केटी भाई। ।
तुम सब आपन दुःख कहि डॉरय
ओही लाग पुनेठी भाई। ।
सबै पालटी हइ दगाहिल
को लहुरी को जेठी भाई। ।
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मोबाइल मा
सरासरीहन लबरी हिबै मोबाइल मा।
सुन्दर कानी कबरी हिबै मोबाइल मा। ।
क्याखर कासे प्यार की बातैं होती हैं
दबी मुदी औ तबरी हिबै मोबाइल मा। ।
विस्वामित्र मिसकॉल देख बिदुराय लगें
अहा !मेनका परी हिबै मोबाइल मा। ।
नई सदी के हमूं पांच अपराधी हन
जाति गीध कै मरी हिबै मोबाइल मा। ।
कोउ हल्लो कहिस कि आँखी भींज गयीं
कहू कै खुश खबरी हिबै मोबाइल मा। ।
अब ता दण्डकवन से बातें होती हैं
श्री राम कहिन कि शबरी हिबै मोबाइल मा। ।
''हँस ''बइठ हें भेंड़ा भिण्ड बताउथें
द्याखा कइसा मसखरी हिबै मोबाइल मा। ।
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य कइसा छब्बिस जनबरी।
य कइसा छब्बिस जनबरी।
मरै पेंटागन गनी गरीब
जिअय देह नंगी उघरी। ।
पंचाइत से संसद तक डाकू गुंडन का पहरा है।
शासन की हैं हियव की फूटी अउर प्रशासन बहिरा है। ।
एक न सुनै एक नहीं द्याखै कासे भइलो बात करी।
उई पीरा का पाठ पढ़ामै जेखे लगी न फांस।
भूंखा सोबइ घर का मालिक चाकर चाटय चमन प्रास। ।
ई सेबक खा ल्याहै देस का इन खे नहि आय नरी गरी।
ऐसी कै बइहर का जानै कइसा ज्याठ बड्यारा।
का जानै डनलप कै गद्दी कइसन ह्वा थै द्यारा। ।
महलन माही पले गलइचा जानै कइसा टाट दरी।
छल प्रपंच के पहिया माही लोकतंत्र कै गाड़ी।
केतू जगै रात भर हरिया खेत खा थी बारी। ।
दरबारन से चउपालन तक चारि रहें सांड वसरा पहरी।
करजा लइके खाय रहेन घी अर्थ ब्यबस्था परी उतान।
भुखमरी बेकारी बोल रही है जय जबान औ जै किसान। ।
गभुआरन कै भूंख खाय आंगनवाड़ी पगुरात खड़ी।
कउने मुँह से स्वाहर गाई गणतंत्र पर्व के बास्कट के।
हम कब तकअभिनन्दन गाई डाकू गुंडा चोरकट के। ।
सत्य अहिंसा अउर त्याग कै हमरे देश मा लहास परी।
चला मिटाई भष्टाचार ता लिख जइ नई इबारत।
अपने देस के भभिस्य का सउपी साफ इबारत। ।
गाँधी पटेल के लउलितियन के संकल्पन का पूर करी।
हेमराज या हमरे देस कै करुना भरी कहानी आय।
मदारी के रहत बंदरिया का दोख द्याब बेइमानी आय। ।
तबहिन ही छब्बिस जनबरी। य कइसा छब्बिस जनबरी।
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गदहिया काकी
एक रोज गदहा काका से कहिस गदहिया काकी।
पकिगा प्याट य भारा ढ़ोबत परै भाग मां चाकी॥
हमही परै अजार य होइ जाय कउनौ अनहोनी।
इसुर य तन लइके हमही देय मनई कै जोनी।
यतना सुनतै गदहा काकू लगें खूब अनखांय।
कहिन शनीचर तोहइ चढा है औ चटके ही बाय॥
येहिन से तुम मांगि रह्या है वा मनई का क्वारा।
जउन बरूद के गड्ड मां बइठे होइन भूंजै होरा॥
जे अपने स्वारथ मां ढड़कै मिरजापुर कस लोटिया।
पानी पी के चट्टय फ्ोरै जे पउसरा कै मेटिया॥
जे जात धरम भांषा बोली मां करबाउथें जंउहर।
जे नेम प्रेम भाईचारा से मिलैं न कबहूं जिवभर॥
जे ईटा गारा निता बहामै अपने भाई का रक्त।
भले पीलिया केर बेजरहा अस्पताल मां मरै बेसक्त॥
रक्तदान न द्याहै ओही भले सड़क का सींचै।
जउन बंदा भगतन से दइअव केर कर्याजा हीचै॥
अइसा रूक्ष दुइ गोड़ा गड़इता कै मगत्या तुम जोनी।
जे मजूर के खून पसीना कै भख लेय करोनी॥
मनई से नीक ता हमरै जात ही सुना गदहिया रानी।
चुहकै नही अरक्षण कोल्हू प्रतिभा केर जमानी॥
लख्यन लालू के ढंग का देखे रंझ ही तोहरे जिव का।
पै हम पशु पच्छिन के खातिर जीतीं अबै मेंनका॥
तुम गुलाब का सपन न द्याखा बना निराला केर कुकुरमुत्ता।
य मनई से वफादार है हमरे देस का कुत्ता॥
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हमार भेड़ा
पूरुब मा पुरान ताल फूले हें कमल जहां
अउर पच्छिम कइती जहां सदा नीरा सागरा।
दक्खिन मा राजपथ लगा थै अगस्त अस
उत्तर मा हरा भरा बिंध अस डोगरा। ।
चउकी चटकउला मा बिराजे अंजनी के लाल
ताल गहिरार नबा ताल संतोखरा।
गांव मध्ये चंडी देवी औ बिराजे भोलेबाबा
अउर श्री गनेश जू जे सिद्ध करैं अखरा। ।
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चउकी चटकउला मांही लागथाबै मेला जहाँ
लुदुइआ मा है सेबाद हुआं लड्डू पेड़ा का।
गांव कै बिबेक मान जनता मा है स्वाभिमान
अंतर वा जनाथीबै रूख अउर रेंड़ा का। ।
मेल जोल के सुभाव केर परिपाटी हिंया
मह्काबै माटी जहां पस्गाइयत मेड़ा का।
लोक रंग का उराव सब मा है एक भाव
कवि हेमराज सौ प्रनाम करै भेड़ा का। ।
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कबिता
अपना का सेतै लगै अब माख
अपना का सेतै लगै अब माख सिरी मान
,जन गन मन कै केहनी रही कबिता।
आतातायी बहेलिया के तीर के बिपछ माही ,
पंछिन के आँख केर पानी रही कबिता।।
लोकतंत्र पिअय लाग अंगरेज घाइ खून
दीन दुखियन का पीर सानी रही कबिता।
ठठुरत हरिआ खदान कै मेहरिआ कै
औ बिना बड़ेरी बाली छान्ही रही कबिता। ।
योजना से हित ग्राही जोजन खड़ा है दूर
ब्यबस्था कै कइसा के सराह बनी कबिता।
जउन भाईन केर हीसा भइबय हड़पि धरे
जरि रही छाती वखार आह बनी कबिता।।
डूबि रहे जात बाद बाली जे नहर माही ,
उनही बचामै का मल्लाह बनी कबिता।
प्रहलाद प्रेम पथ माही जे लगामै बारी ,
अइसा हिरनकश्यप का बराह बनी कबिता। ।
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बंदेमातरं
सरग से नीक मोरे देस कै य धरती ही,
जिव से है अधिक पियार बंदेमातरं।
रूपसी के देंह से ही स्वारा आना सुंदर य,
आपन माटी देश कै सिंगार बंदेमातरं॥
बहै नदी कलकल पानी करै छलछल,
टेराथें पहार औ कछार बंदेमातरं।
जहां बीर बलिदानी भारत का बचामै पानी,
सूली माही टगिगे पुकार बंदेमातरं॥
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नेता जी
उइ कहा थें देस से गरीबी हम भगाय देब
गरीबी य देस कै लोगाई आय नेता जी।
गरीबी भगाय के का खुदै तू पेटागन मरिहा
वा तोहई पालै निता बाप माई आय नेता जी। ।
गरीबी के पेड़ का मँहगाई से तुम सींचे रहा
तोहरे निता कल्प वृक्ष नाइ आय नेता जी।
भाषन के कवीर से अस्वासन के अवीर से
वा तोहरे बोलिआय का भउजाई आय नेता जी । ।
योजना के तलबा म घूँस का उबटन लगाये ,
भ्रष्टाचार पानी म नहाये रहा नेता जी।
चमचागीरी के टठिया म बेईमानी का व्यंजन धरे
मानउता का मूरी अस खाये रहा नेता जी।।
गरीबन के खून काही पानी अस बहाये रहा
टेंटुआ लोकतंत्र का दबाये रहा नेता जी।
को जानी भभिस्स माही मौका पउत्या है कि धोखा
लूट लूट बखरी बनाये रहा नेता जी। ।
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दारू बन्द बिहार मा लागू कड़क अदेश।
भर धांधर जो पिअय खै आबा मध्य प्रदेश। ।
आबा मध्य प्रदेश हियां ता खुली ही हउली।
पानी कै ही त्रास भरी मदिरा कै बउली। ।
पी के चह जेतू मता कउनव नहीं कलेश।
नवरत्रिव पाबन्दी नहीं अपने मध्य प्रदेश।।
गांव गांव मदिरा बिकै दबा शहर के पार।
कउने शब्दन मा करी अपना का आभार।।
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हंस देख चउआन है नये नये परपंच।
भारी बहुमत जीत के मिलै न सत्ता संच। ।
मिलै न सत्ता संच उड़ रही खिल्ली।
एक एक कई टूट रही ''बहरी ''कै तिल्ली। ।
जनता बपुरी सहि रही राजनीत का दंश।
नंगदाय का देख के हक्का बक्का हंस। ।
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चांदनी
चितवाथी चरिउ कइ चरकी चमक चंद,
चपल चोचाल अस चोंख चोंख चांॅदनी।
काहू केर जिव करै पपीहा अस पिउ पिउ,
नेह स्वाति बूंद का लगाबै दोख चांदनी॥
सुकवा जो अस्त भा ता उआ है अगस्त जी मां,
प्रेम पंथ पानी काही सोख सोख चांॅदनी॥
चकई के ओरहन राहू केर गिरहन,
रहि रहि जाय मन का मसोस चांॅदनी॥
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पोखरी का पानी जब से थिराय दरपन भा,
तब से जोंधइया रूप राग का सराहा थी।
ठुमुक ठुमुक चलै लहर जो रसे रसे,
देख देख के तलइया भाग का सराहा थी॥
चांदनी से रीझ रीझ पत्ता पानी मां पसीझ,
पुरइन पावन अनुराग का सराहा थी।
जे निहारै एक टक सांझ से सकार तक,
जोंधइया चकोर के वा त्याग का सराहाथी॥
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झेंगुर कै तान सुन नाचै लाग जुगनूं ता,
अस लाग जना दीप राग तान सेन का।
भितिया मां चढि के शिकार करै घिनघोरी,
जइसन लदेन' कांही मारा थै अमेरका॥
ओस कै बूंद जस गिरत देखाय नही,
सनकी से बात करैं जइसा पे्रमी प्रेमका॥
तन केर मन से जो ताल मेल टूटिगा है,
तब से चरित्र होइगा विश्वामित्र मेनका॥
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फगुनहटी बयार
चलै मस्त बयार पिआर लागै ,महकै महुआ अस देह के फागुन।
सरसो निकरी पहिरे पियरी औ सुदिन सेँधौरा के नेह के फागुन। ।
जब काजर से मेहदी बोलिआन ता घूँघट नैन मछेह के फागुन।
औ लाजवंतीव डीठ लागै जब रंग नहाय सनेह के फागुन। ।
आसव करहा नौती कड़बा ता गामै लगा अमराई मा फागुन।
हाथी अस चाल चलै जब गोरी ता महकै हाथ कलाई मा फागुन।।
गाल मा फागुन चाल मा फागुन औ गमकत पुरवाई मा फागुन।
देस निता जे निछावर बीर ता भारत के तरुणाई मा फागुन। ।
रंग मा फागुन भंग मा फागुन उमंग उराव के कस्ती मा फागुन।
मस्ती मा फागुन बस्ती मा फागुन मिल्लस बाली गिरस्ती मा फागुन।।
दीन दुखी के मढ़ैया से लइके कोठी हवेली औ हस्ती मा फागुन।
य मंहगाई मा होरी परै कुछु आबै सह्वाल औ सस्ती मा फागुन। ।
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रात रात भर किहन तरोगा
रात रात भर किहन तरोगा हम जेखे अगुवानी मां।
बड़े सकारे मरे मिले उंइ एक चुल्लू भर पानी मां॥
कोउ नही सुनइया दादू चह जेतू नरिआत रहा,
सगला देस सुनिस ‘अन्ना' का जब बोलिन रजधानी मां॥
नंच नंच आँखिन से झांकै बड्डे जबर सपन,
बोली बड़ी पिआर लगाथी तोतली बानी मां॥
शक के नजर से देखे जाथें जब साधू संन्नासी तक,
कइसा उनही रिस न चढी आतंकिन के मेहमानी मां॥
भला पेटागन रहि के कउनौ महाशक्ति का देस बनी,
जेखर जनता भूंखी नंगी टुटही छान्ही मां॥
खूब पैलगी होथी जेखर औ समाज मां मान हबै,
उनही सांझ के हम देखे हन गिरत भंजत रसदानी मां॥
जिअत अगाधैं मरे सराधैं हमरे हेन अनरीत हिबै,
सरमन' सब दिन मारे गे हें सत्ता के मनमानी मां॥
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सगली दुनिया हिबै अचंभित
सगली दुनिया हिबै अचंभित ,दइके नाक रुमाल।
सत्य अहिंसा के धरती मा , करुणा होय हलाल। ।
छाती पीट -पीट के रोबै, साबरमती कै धारा।
अब ता बरुनव के घर माही। धधक रहें अंगारा। ।
कोउ बता द्या राजघाट मा ,गांधी जी से हाल।
जहाँ कै माटी सत्य अहिंसा केर विश्वविद्यालय।
वहै धरा मा बहै खून ,औ मार काट का परलय। ।
गौतम गाँधी के भुइ माही बसे हमै चंडाल।
भारत माता के बिटियन के मरजादा का बीमा।
अब ता उनखे बेसर्मी कै नहि आय कउनौ सीमा। ।
बड़मन्सी कै बोली ब्वालै बड़ बंचक बचाल।
काल्ह द्रोण मागिन तै अउठा ,आज लइ लइन जान।
बिद्या कै पबरित परिपाटी तक होइगै बलिदान। ।
रह्यान कबौ हम बिश्व गुरु पै आज गुरू घंटाल।
शहरन माही आजादी के होथें मङ्गलचार।
आजव भारत के गॉवन का दमै पबाई दार। ।
सामंती के दुनाली से कापि रही चउपाल।
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गाँधी जी
ओ ! राजनीत बाले जती अपना कै मरी मती गाँधी अस जती काही काहे गरिआइ थे।
बापू आय राष्ट बाप बापू आय जातक जाप गौतम केर मरजादा काहे घरिआई थे। ।
सत्ता के भूंख माही सत का मिटाय रहन जनगणमन मा काहे कलह बमुरा लगाई थे।
करी कुछु नीक निकाई बन जाबै लछमी बाई सूर्पणखा अस काहे नाक कटबायीं थे। ।
भारतीय संस्कृति मा नारी है परम पूज्य पढ़ लेइ इतिहास अपना जीजा दुर्गावती कै।
पन्ना धाय अस तप त्याग अनुराग करी कहानी बन जाब अपनव रानी रूप मती कै। ।
मेघा औ टेरेसा अस जन कल्याण करी वतरय पुन मान होइ कुमारी माया वती कै।
कुरसी के तीन पांच मा कुलांच कै न आंच देई भारत माही पूजा हो थी त्याग दया मती कै। ।
अपना से करी चेरउरी नफरत कै न बांटी रेउरी सत्ता केर मउरी या सेरा जई सिताप मा।
काहे बिनाश केर रास तुम रचाय रह्या राग द्वेष इरखा भासा बानी पाप मा। ।
देस का बिकास होइअनेकता के एकता मासब कै सुख शांती ही मनसा बाचा जाप मा।
गाँधी आय गीता रामायण गाँधी आय नर मा नारायण पै तुम हेरे मिलिहा न कऊनव किताप मा। ।
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मस्त माल है।
देस मा चारिव कइती दहचाल है।
फुर फुर बताबा का अपना का मलाल है।।
दिल्ली अपने मन कै बात बाँचा थी
कबहूँ नहीं पूछिस कि देसका का हाल है। ।
कूकुर के चाबे मा भोंका थी मीडिआ
गऊशाला नहीं झांकै की भूसा पुआल है। ।
सरकारी दफ्तर मा घूंस बिना काम नहीं
हर कुरसी पाले एकठे दलाल है। ।
हमरे संस्कार का येतू पतन भा
वा बहिनी बिटियन का कहाथै मस्त माल है। ।
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जब से आपन गाँव।
शहर मा जाके रहय लाग जब से आपन गाँव।
भरी दुपहरी आँधर होइगै लागड़ होइ गै छाँव। ।
गाँवन कै इतिहास बन गईं अब पनघट कै गगरी।
थरी कोनइता मूसर ज्यतबा औ कांडी कै बगरी। ।
गड़ा बरोठे किलबा सोचइ पारी आबै माव ।
हसिया सोचै अब कब काटब हम चारा का ज्यांटा।
सोधई दोहनिया मा नहि बाजै अब ता दूध का स्यांटा। ।
काकू डेरी माही पूंछै दूध दही का भाव।
दुर्घट भै बन बेर बिही औ जामुन पना अमावट।
''राजनीत औ अपराधी ''अस सगली हाट मिलावट। ।
हत्तियार के बेईमानी मा डगमग जीवन नाँव।
जब से पक्छिमहाई बइहर गाँव मा दीन्हिस खउहर।
उन्हा से ता बाप पूत तक करै फलाने जउहर। ।
नात परोसी हितुअन तक मां एकव नही लगाव।
कहै जेठानी देउरानी के देख देख के ठाठ ।
हम न करब गोबसहर गाँव मा तोहरे बइठै काठ। ।
हमू चलब अब रहब शहर मा करइ कुलाचन घाव।
नाती केर मोहगरी ''आजा'' जुगये आस कै बाती।
बीत रहीं गरमी कै छुट्टी आयें न लड़िका नाती। ।
खेर खूंट औ कुल देउतन का अब तक परा बधाव।
ममता के ओरिया से टपकें अम्माँ केर तरइना।
फून किहिन न फिर के झाँकिन दादू बहू के धइन.। ।
यहै रंझ के बाढ़ मां हो थै लउलितियन का कटाव।
शहर मा जाके ----------------------------------------
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होरी फगुआ
कइसन खेलै होरी जनता रोरी हबै न रंग।
पानी तक ता दुरघट होइगा कइसा घोटै भंग।।
दांती टहिआ कलह दंभ का हिरना कश्यप राजा।
राजनीत होलिका बजाबै लोकतंत्र का बाजा।।
प्रहलाद प्रेम भाईचारा कै नहिआय कहूं उमंग ।
महंगाई बन के आई ही हमरे देस मा हुलकी।
तब कइसन के चढै करहिआ कइसन बाजै ढोलकी।।
भूंखे पेट बजै तब कइसा या खंझनी मृदंग।।
फूहर पातर भासन लागैं होरी केर कबीर।
छूंछ योजना कस पिचकारी आश्वासन का अबीर।।
लकालक्क खादी कुरथा मा भ्रष्टाचारी रंग।
कुरसी बादी राजनीत मिल्लस का चढाबै फांसी।
आपन स्वारथ सांटै खातिर पंद्रा अउर पचासी।।
नरदा अपने आप का मानै गंगा केर तरंग।
कहूं बाढ कहु सूखा है कहु महामारी का ग्रास।
कहूं ब्याबस्था जन जीबन का कीन्हिस जिंदा लास ।।
जने जने की आंखी भींजीं दुक्ख सोक के संग।।
कइसन खेलै होरी जनता रोरी हबै न रंग।।
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मैहर 29 मई 1997
मैहर है जहां बिद्या कै देबी बिराजीं मां शारद शक्ति भवानी ।
पहिलय पूजा करै नित आल्हा औ देबी के बर से बना बरदानी।।
मैहर है जहां लिलजी के तट मठ माही सिव हे अउघर दानी।
मैहर है जहां संगम है सुर सरगम कै झंकार सुहानी।।
पै 29 मई 97 कां हि पतझर घांई निझर गा तै मइहर।
सरकारी गुंडन के गोली औ डंडन से जलिआ कस बाग उजर गा तै मइहर।।
सारद माई का पावन तीरथ मरघट घांई व जल गा तै मैहर।
सायरन सींटी अन्याय अनीती औ करफू के पांव चहल गा तै मैहर।।
खून कै नद्दी बही हेन दद्दी पै डोला न दिल्ली भोपाल का आसन।
गृह मंत्री जी संतरी तक नहि भेजिन न आये हेन दिग्गी प्रदेश के सासन।।
मैहर है जहां खेली गै ते मजदूर के रक्त से खून कै होरी।
तड़तड़ गोली धसी जहां सीना मा मारिन तै निर्दयी अखोरी। ।
लहास बिछाय दइन सड़कन मा लागै नगर बिना धनधोरी।
ईट औ पाथर तक जहा रोयें ते पै न पसीझे उंइ खूनी अघोरी।।
न्याव के मांगे मा मांग का सेदुर पोछ के होइगा कलंकित मैहर।
श्रमिकन का जहा खून बहा औ घायल रक्त से रंजित मैहर।।
मानउता किल्लाय उची पै करुना दया से है खंडित मैहर।
आजौ गुलामी औ डायर हें इतिहास के पन्ना मा अंकित मैहर।।
29 मई 97 कहि केत्तव का पालन हार गुजर गा।
केत्तिव राखी भयीं बिन हांथ अनाथ व केत्तेव बचपन कर गा।।
नहाय गा खून से मैहर पै बरखास न भा एक थाने का गुरगा।।
अंगना मा जेखे भयीं है कतल अब छान करी वा सारद दुरगा।।
अहिंसा के नाती हे हिंसक घाती औ उनखर आंखी हिबै बिन पानी।
जइसन आस करै कोउ कोकास से ओइसय होइगै जांच कहानी।।
न्याव के हँस का खाय गें कंस छनाइन बगुला से दूध का पानी।
'हँस' उरेही कसाई के पाप का जब तक हांथ रही मसियानी।।
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चिठ्ठी
आजु दुइ बजे रजधानी से एक ठे चिठ्ठी आई।
वमै लिखा तै मतदाता का मूर्ख दिवस कै बधाई।।
जउन चुनाव जिताया हमही वाखर हयन अभारी।
हमरव भाव बढे हें खासा मंडी कस तरकारी।।
जबसे चुन के भेज्या हमही लगा थी लमहर बोली।
यहै बहाने लोकतन्त्र से हो थी हंसी ठठोली।।
भुखमरी बेकारी टारैं बाली हमसे कर्या न आस।
ईं चुनाव के मधुबन माही आहीं सइला रास।।
टी बी माही देखत्या होइहा उजर भभिस्य के धइना।
हम अंधरन के घर लगबाउब चार चार ठे अइना।।
बड़े भाग से हम बन पायन गद्दी के अधिकारी।
दिन बीतै ऊंटी सिमला मा क्लब मा रात गुजारी।।
संपाती अस सुरिज के रथ कै मन मा ही लउलितिया।
चाहे केत्तव नफरत बाली ठाढ होइ जाय भितिया।।
जइसा सब का जान्या मान्या ओइसय हमीं समोखा।
हमरेन दारी खोल त्या हा सिद्धांतन केर झरोखा।।
हरबिन मिलब आय के तोहसे कइके खाली कोस।
हम छानी हेन माल पुआ तुम रहा ब्रते परदोष।।
एक मतदाता पढ के चिठ्ठी चट्टै लिखिन जबाब।
अपना परंपरा का पाली हम ठगर्रत जाब।।
पै नोन का कान करा थै कंजर येतू लाज ता राखी।
भार उचाई हम कांधा मा अपना सेंतै कांखी ।।
हम मान्यन कोकास की नाई ही अपना कै पांत।
दरसन एकता केर मिला थें धन्न अपना का साथ।।
पै संपाती के लच्छन छ्वाड़ा बन जा गरुड़ जटाऊ।
येत्तेन माही लोकतंत्र कै बदल जइ जलबाऊ।।
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ओ पापी लुच्चा तै पाक
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ओ पापी लुच्चा तैं पाक तोही नही आबै लाज,
जउन साज साज घुसपइठ तैं करउते हे।
लगथै कि भूलि गये गिनती हिजड़ी सेना केर,
पुनि के तै वाखर जन संख्या गिनबउते हे॥
तोरे इतिहास माही नही कुछु रास भांस ,
हमरे भूंगोल माही पीठ तैं दतउते हे।
अइहे जो तैं कश्मीर सेना डारी सीना चीर,
दुइ दारी त देखि चुके पुनि अजमउते हे॥
भारत के मांटी केर वीरता कै परिपाटी,
बांच ले पुरान चाह नये इतिहास का।
भारत के मांटी माही हें जवान वीर शेर,
हेर हेर बीन ल्याहैं धरती अक्काश का॥
मुंह देखी मेलजोल पीठ पीछ बैर मोल,
तोर दोगली य चाल दुअरा विनाश का।
अरे दीदी जो पिआये दूध करदे एलान जुद्व,
जिंदय मां बनबा ले कब्र अपने लहास का॥
हिमालय से ज्वालामुखी फूट के निकर परी,
सह पइहे आंच तै न हिन्दुस्तानी वीर के।
वा दारी त दुर्गा रहीं य दारी हें महाकाल,
भुट्टो अस होइ हाल तोरव त अखीर के॥
रे ढीठ नीच मान बात कर न तै उत्पात,
भारतीय भूंगोल मांही सरहद तीर के।
जब तक सुरिज औ चन्दा हें अकास मांही,
धरती मां लहरइ तिरंगा कश्मीर के ॥
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सुन इस्लामबाद
⸎⸎⸎⸎⸎⸎⸎⸎⸎⸎⸎⸎⸎⸎⸎
अब दिल्ली ललकार उची,सुन रे इस्लामाबाद।
कोलिया के झगड़ा मां अबकी बिक जइ सगला बांध ॥
नीक के आखर आंखर पढ,इतिहास पोथन्ना खोल।
हमहिन आह्यन वहै वंश,जे बदल दइस भूंगोल॥
बंग्लादेश के बदला बाली, पूर न होई साध।
अब दिल्ली...............................................
हम तोही मउसी अस लड़िका,अपने जिव मां चाही।
हमरेन घर मां सेंध मार तैं, करते हये तबाही॥
बे कसूर के हत्या का तै,कहते हये जेहाद'॥
अब दिल्ली.......................................................
हमरे देस मां करै उपद्रव, तोर गुप्तचर खुपिया।
हांथ मिलामैं का रचते हे,तै नाटक बहुरूपिया॥
एक कइ उत्पात कराउते,एक कइ संवाद॥
अब दिल्ली..........................................
हमरे देस कै पोल बतामै,मीरजफर के नाती।
तोरे भिरूहाये मां बनिगें महतारी के घाती॥
महावीर अब्दुल हमीद कै हमी न बिसरै याद।
अब दिल्ली..........................................
खूनी आतंकवादीन का तै अपने घरे लुकाउते।
औ उपर से हमहीं सोला दूनी आठ पढाउते॥
भारत के हर गाँव गली मां उूधम सिंह कै मांद।
अब दिल्ली ललकार उची सुन रे इस्लामा बाद॥
कोलिया के झगड़ा मां अबकी बिक जइ सगला बांध।
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भारत के रणचंण्डी का
डट के खूंन पिआया बीरव भारत के रनचंडी का।
लाहौर पेशावर मां गाड़्या अब जाय तिरंगी झंडी का॥
कहि दिहा हिमालय से संदेश कि वा है अबै अनाथ नही।
सागर का बड़वानल उत्कल द्रविण विन्ध्य है साथ महीं॥
बीर शिवा जी केर जोश औ टेई धरी भवानी ही।
दुश्मन का खून पिअय खातिर हेन तड़पत ठाढ़ जबानी ही॥
छिन मां तहस नहस कइ द्याहै आतंकबादी मंडी का।
डट के खूंन ............................................................
पुनि के खउलै लाग खून अब राजस्थनी माटी का।
जाट गोरखा तामिल तेलगू बलिदानी परिपाटी का॥
प्लासी बक्सर असम कोहिमा संन्नासी कालिंग का।
देसभक्त पंजाब का पानी औ गढवाली सिंह का॥
सगला देस साथ मां तोहरे राजमार्ग पगडंडी का।
डट का खून......................................................
रूण्ड मुंण्ड कै माला पहिरे काली रन मां निकर परी।
औ महाकाल कै तीसर आंखी प्रलय भयंकर उघर परी॥
अब की दारी द्याव ठीक से द्याब पाक अउठेरी का।
आर पार तक रार ठनी अब बजैं द्या रनभेरी का॥
ओ बीर जबानव सबक सिखाबा कालनेमि पाखण्डी।
डट का खून......................................................
वा भूल चुका इंदिरा जी का दुर्गा कै पदवी पाइन तै।
नब्बे हजार पकिस्तानिन से कनबुड्डी तनबाइन तै॥
भूंगोल बदल गै दुनिया कै तब मुंह से कढी अबाज नही।
पुनि भडुअन कै फउज जुरी नकटन का आबै लाज नही॥
हम राणा प्रथ्वी के बंसज वा गोरी कू्रर शिखंडी का।
डट के खूंन पिआया बीरव भारत के रनचंडी का॥
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सब मनसेरुआ हें
गरीबन के निता सब मनसेरुआ हें।
बिचारे के खटिआ मा तीन ठे पेरूआ हें। ।
चाह रजन्सी रही होय य की लोकतंत्र
मंहगाई गुंडई पकरिन ओकर चेरुआ हें। ।
वा सदमा से भनेजिन बिहोस परी ही
मामा कहा थें संच मा भइने बछेरुआ हें। ।
जब से महँग भै दार ता लपटा खई थे
उनखे निता चुकंदर हमहीं रेरुआ हें । ।
उनखे सुची रास मा गउर धरी ही
सत्तर साल से हंस के गोहूँ मा गेरुआ हें। ।
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आबा मुखिया जी स्वागत है
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आबा मुखिया जी स्वागत है।
शारद मइया कै धर्म भूमि।
य 'बाबा 'जी कै कर्म भूमि। ।
भुइ गोलामठ औढरदानी कै ।
सम्पत तेली बलिदानी कै। ।
मुड़िया बाबा के धूनी मा
बंदन अभिनन्दन शत शत है। ।
आबा मुखिया जी स्वागत है। ।
हेन ही मिल्लस कै परिपाटी।
पुरवा ,ओइला ,गणेश घाटी। ।
औ रामपुर के राधा किशना।
दर्शन से मिटै धृणा तृष्णा। ।
बड़ा अखाडा मा मनस्वनी
कै पयस्वनी निकरत है। ।
आबा ---------------------
या विंध्य द्धार लेशे है कलश।
पानी लये कलकल बहै टमस। ।
जब से ठगि के गें हें कुम्भज।
ता विंध्य का निहुरा है गुम्मच । ।
गुरू अगस्त के निता झुका है
या अटल झुकेही का ब्रत है। ।
आबा मुखिया ----------------
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काल्ह मिला
काल्ह मिला एक ठे प्रत्याशी।
मिलनसार कर्मठ मृदु भाषी। ।
ईमानदार औ खूब जुझारू।
पिये रहा घुटकी भर दारू। ।
छरकाहिल जे रहा काल्ह तक
देखतै हमही सघराय लग।
तन से मुरइला मन से नाग। ।
मुँह मा लये बिदुरखी बासी।
काल्ह-----------------
व विकास कई करै न बात।
लगा गिनामै जात औ पात। ।
बाम्हन ठाकुर काछी पटेल।
राजनीत कस ख्यालै खेल। ।
पिछड़ा पन्द्रह और पचासी।
काल्ह ------------------
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शौचालय बनवाबा
शौचालय बनवाबा भाई शौचालय बनवाबा।
अपने घर के बड़मंशी का बहिरे न बगवाबा। ।
हमरी बहिनी बिटिया बहुअय बपुरी जांय बगारे।
यहैं तकै झुकमुक ब्यारा का वहै उचै भिनसारे। ।
घर के मरजादा का भाई अब न यतर सताबा।
शौचालय बनवाबा भाई शौचालय बनवाबा। ।
फिरंय लुकाये लोटिया बपुरी मन मा डेरातीं आप।
निगडउरे मा बीछी चाबै चाह खाय ले सांप। ।
सबसे जादा चउमासे मा हो थें जिव के क्याबा।
शौचालय बनवाबा भाई शौचालय बनवाबा। ।
तजी सउख मोबाइल कै औ भले न देखी टीबी।
शौचालय बनवाई घर मा अपना हन बुधजीबी। ।
सरकारव कइ रही मदद औ कुछ अपने से लगाबा।
शौचालय बन बनवाबा भाई शौचालय बनवाबा। ।
जब घर मा शौचालय होइ ता ही घर कै सज्जा।
तब न खेत बगारे बागी अपने घर कै लज्जा। ।
करा कटौती अउर खर्च कै निर्मल घर बनवाबा।
शौचालय बनवाबा भाई शौचालय बनवाबा। ।
शौचालय बनवाय घरे मा चला गंदगी पहटी।
पाई साँस जब शुद्ध हबा हरहजा रोग न लहटी। ।
चला 'हंस 'सब जन कोऊ मिल के य संकल्प उछाबा।
शौचालय बनवाबा घर मा शौचालय बनवाबा। ।
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****************** चुगल खोर******************
हम करी चेरउरी चुगल खोर तुम सुखी रहा य देस मा।
तुम बइठे नक्कस काटा औ सब जन रहैं कलेष मा। ।
हे अकरमन्न हे कामचोर सब काँपैं तोहरे दांव से।
कड़ी मशक्कत के कर्ता तक भागै तोहरे नांव से। ।
तुमसे सब है कारबार जस धरा धरी है शेष मा।
हे चापलूस चउगिर्दा हेन तोहरै तोहार ता धाक हिबै।
तोहरेन चमचागीरी से हमरे नेतन कै नाक हिबै। ।
तुम कलजुग के देउता आहू अब माहिल के भेष मा।
हे !महा दोगला हे अकही !!अकहापन कै पूंजी तुम।
बड़ा मजा पउत्या है जब आने कै करा नमूजी तुम। ।
गद्गद होय तोहार आत्मा जब कोउ परै कलेस मा।
तुम 'मनगवां के कुकूर कस ' चारिव कइती छुछुआत फिरा।
मुँह देखी मा म्याऊ म्याऊ औ पीठ पीछ गुर्रात फिरा। ।
सगले हार तोहार असर है देस हो य परदेस मा।
केत्तव होय मिठास चाह छिन भर मा माहुर घोर द्या।
तुम भाई हितुआ नात परोसी का आपुस मा फोर द्या। ।
तोहरे भीरुहाये मा पति -पत्नी तक चढ़ गें केस मा।
हे मंथरा के भाई तुम जय हो हे नारद के नाती।
नाइ दुआ करत बागा बे डाक टिकस कै तुम पाती। ।
हे राम राज के 'धोबी 'तुम घुन लाग्या अवध नरेश मा ।
हम करी चेराउरी चुगल खोर तुम सुखी रहा य देस मा। ।
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अछूत
जुगन बीति गें पुरखन पीढ़ी पियत य माहुर घूंट।
अपनेन देस के माटी मा हम कब तक रहब अछूत। ।
एक दइव की हम सन्तानै कहै पुरान औ वेद।
तब काहे का छुआ छूत औ जातपांत का खेद।।
इसुर ता सब के बांधे है लाल रंग का सूत।
अपनेन देस के-----------------------
हमिन रची देवालय का औ मूरत हमिन बनाई।
औ जब पूजा करय जई ता भीतर घुसै न पाई। ।
हमरे पुजहाई टठिया का पंडित कहैं अछूत।
अपनेन देस के..............
रामराज भें उदय राज ता खूब मचाया हल्ला।
पै समाज के या कुरीत का किहा न एकव तल्ला। ।
कइसा रुकी धरम परिवर्तन या तोहरे करतूत।
अपनेन देस के............................................
धरम कै चिन्ता ही ता पहिले छुआछूत का म्याटा।
आन कै फूली पाछू झांक्या देखा आपन टयाँटा।।
''ईश्वर अंसही कछु नहि भेदा ''तुलसी कै कहनूत। ।
अपनेन देस के माटी मा हम कब तक रहब अछूत। ।
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हम सरबरिया बाम्हन आह्यन
हम सरबरिया बाम्हन आह्यन मिलब साँझ के हाउली मा।
मरजादा का माजब धोऊब नरदा नाली बाउली मा। ।
होन मेल जोल भाई चारा कै साक्षात् हिबै तस्बीर।
नक्सल्बादी असम समिस्या औ नहि आय झंझट कश्मीर। ।
अगड़ा पिछड़ा आरछन का लफड़ा बाला नहि आय भेद।
जात -पात अउ छुआछूत के ऊंच -नींच के नहि आय खेद। ।
समता मिलै हँसत बोलत होन पैग भजिआ लपकाउरी मा। ।
एक नाव एक भाव मा बइठे मिलिहै राजा रंक औ फक्कड़।
बड़े -बड़े परदूसन प्रेमी मिलिहै सुलगाये धुँआ औ धक्कड़। ।
रक्शा बाले -नक्शा बाले शिक्षा स्वस्थ्य सुरक्षा बाले।
बने पुजारी सरस्वती के अद्धी पउआ बोतल घाले। ।
बड़े शान से भाषन झारत मद्ध निषेध के रैली मा। ।
भले दये अदहन चुलबा मा ताकै टोरबन कै महतारी।
औ हमार या अमल सोबाबै रात के लड़का बिना बिआरी। ।
हमही चाही रोज साँझ के मुर्ग मुसल्लम पउआ अद्धी।
शहर गॉव मा लूट मार कई देइ ढ़ील कनून कै बद्दी। ।
हम बिन सून ही राजनीत जस खरिहान कुरईली मा। ।
महुआ रानी पानी दय दय हमही बनै दिहिस लतखोर।
पहलमान अस अकड़ रहे हन भले हबै अंतस कमजोर।।
बीस बेमारी चढ़ी है तन मा तउ नही या छूटै ट्याव।
मदिरा तजा विक्ख की नाइ डिग्गी पीटा गांव -गांव। ।
नही पी जयी या समाज का बगाई कौरी कौरी मा।
चला करी प्रण आइस भाई कोउ जाय न हौली मा। ।
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हमरे घर के आगी का
बदला नाव बैसुन्दर होइगा।
जे आने का हड़पिस हीसा
ओही आज भगन्दर होइगा। ।
लोभ दिहिन उई बन के बदरी
फसल जमी ता निचंदर होइगा। ।
बन गा सोने का मृग मामा
औ साधू दसकंधर होइगा। ।
पुन के छली जई अब वृंदा
आतताई जलंधर होइगा। ।
चुहकै लगे ख़ून जनता का
उनखर पेट सिकंदर होइगा। ।
जहा समाती है सब नदिया
वाखर नाव समन्दर होइगा
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बंदेमातरं
सरग से नीक मोरे देस कै य धरती ही,
जिव से है अधिक पियार बंदेमातरं।
रूपसी के देंह से ही स्वारा आना सुंदर य,
आपन माटी देश कै सिंगार बंदेमातरं॥
बहै नदी कलकल पानी करै छलछल,
टेराथें पहार औ कछार बंदेमातरं।
जहां बीर बलिदानी भारत का बचामै पानी,
सूली माही टगिगे पुकार बंदेमातरं॥
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रोजी कै बात कर
रोजी कै बात कर रोटी का बात कर.
गरीब हें निपरदा लगोटी कै बात कर।।
त्रहि त्राहि मची ही पानी कै देस मां
नाहक न बहैं पाबै टोंटी कै बात कर।।
भरे कंठ माही बिक्ख नीलकंठ बन,
समाज माही सीलासपोटी कै बात कर।।
भले कल्लाथै पै कुतकुती तो ही,
भउजाई केर चींथी चिकोटी कै बात कर।।
जे आने क खनिस गड़बा आपै सकाय गा,
नीकी हेर निंदा न खोटी कै बात कर।।
बलार के गरे मां घंटी न बांध हंस
पिंजरा बंद मिठ्ठू चित्रकोटी कै बात कर।।
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बघेली गजल
ठोंका तुहू सलामी भाई।
भले देखा थी खामी भाई। ।
केत्तव मूसर जबर होय पै
वमै लगा थी सामी भाई। ।
सत्तर साल के लोक तंत्र का
ग्यारै लाग बेरामी भाई। ।
एक कइ पचके हें गलुआ
औ एक कइ ललामी भाई। ।
पता नही धौ घुसे हें केत्ते
बड़ी जबर ही वामी भाई। ।
केखर केखर मुँह सी देहा
सबतर ही बदलामी भाई। ।
भले खा थें उई हराम का
पै न कह्या हरामी भाई। ।
'हंस 'करय अनरीत अम्मलक
भरा हुंकारी हामी भाई। ।
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बघेली गजल
गुड़ देखाय के गूड़ा कै बात करा थें।
मूड़ घोटाय के जूडा कै बात करा थें।।
कहां से उनखे देहें का खून खऊलय,
चूड़ी पहिर के चूड़ा कै बात करा थें। ।
बपुरी देस भक्ती बिहोस परी ही ,
चाबिस ही बीछी सूंडा कै बात करा थें। ।
घोटालन का घुरबा लगा है भोपाल मा ,
चौपालन से बहरी कूड़ा कै बात करा थें। ।
खेत -खरिहान बेचै कै तयारी ही,
बखरी के बखारी से पूड़ा कै बात करा थें। ।
बहिगै सत्ता के धारा मा ३७० ,
नाटक मा मदारी जमूरा कै बात करा थें। ।
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जातिहाई का जानिगें उइ अटकर अंदाज।
सुदिन देख ह्यराय चलें जब बिटिया का काज। ।
जब बिटिया का काज जबर है दइजा नाहर।
सुन दहेज़ का भाव थूंक न निकरै बाहर। ।
बिन दइजा के बड़ मंशी का को अपनाई।
हंस कहिन बस वोट के खातिर ही जातिहाई।।
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भ्रष्टाचार मा लग रहा एकव नही लगाम।
बिना घूँस के होय न एकठेव लिग्धा काम। ।
एकठेव लिग्धा काम कि जनता ही चउआनी।
हाहाकार मचा है बाउर ही रजधानी। ।
चाहे राशन कार्ड हो या कि हो आधार।
रिसवत हर जंघा लगी पसरा भ्रष्टाचार। ।
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अम्मा हमहूं करब पढाई
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अम्मा!हमहूं करब पढाई।
हम न करब घर कै गोरूआरू
औ न चराउब गइया।
कह दद्दा से जांय ख्यात
औ ताकै खुदै चिरइया॥
हम न करब खेतबाई।
अम्मा.........................
आज गुरूजी कहिगें हमसे
तु आपन नाव लिखा लया।
पढ लिख के हुशिआर बना
औ किस्मत खुदै बना ल्या॥
येहिन मां हिबै भलाई।
अम्मा..........................
गिनती पढबै पढब दूनिया
बाकी जोड़ ककहरा।
अच्छर अच्छर जोड़.जोड़ के
बांचब ठहरा ठहरा॥
औ हम सिखब इकाई दहाई।
अम्मा.............................
हम न खेलब आंटी डंडा
औ न चिरंगा धूर।
पढब लिखब त विद्या माई
द्याहैं हमी शहूर॥
करब देस केर सेवकाई।
अम्मा ......................
बहुटा गहन कइ अंउठा
लगा के दद्दा कढैं खीस।
देंय बयालिस रूपिया बेउहर
लिखै चार सौ बीस ॥
ल्याखा ल्याबै पाई पाई।
अम्मा हमहूं करब पढाई॥
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पावस कै रित
रिमझिम रिमझिम मेंघा बरखै थिरकि रही पुरवाई।
धरती करै सिगार सोरहौ पावस कै रित आई॥
भरे डवाडब ताल तलइया कहूं चढी ही बाढ।
एकव वात न लेय किसनमां जब से लगा अषाढ॥
बोमैं बराहैं नीदै गोड़य करैं नीक खेतवाई।
रिमझिम.........................
भउजी बइठे कजरी गउतीं भाई आल्हा बांचै।
टिहुनी भर ब्वादा मां गाँवन की चउपालै नाचै॥
करय पपीहा गोइड़हरे मां स्वाती केर तकाई।
रिमझिम.......................
गउचरनै सब जोतर गयीं ही रखड़उनी मां बखरी ।
धधी सार मां गइया रोउत खूब बमातीं बपुरी॥
मइया धेनु चरामै जइहौं'' मचले किशन कन्हाई॥
रिम झिम..........................
चउगानय अतिक्रमण लीलगा लगी गली मां बारी।
मुड़हर तक जब पानी भरिगा रोमय लाग ओसारी॥
कहिन फलाने खूब फली= पटवारी कर मिताई।
रिमझिम.................
चुंअय लाग छत स्कूलन कै दइव बजाबै ढोल।
एक दउंगरै मां लागत कै खुलि गै सगली पोल॥
विद्या के मंदिर मां टोरबा भीजत करै पढाई।
रिमझिम.......................
जब उंइ पउलै लगें म्यांड़ ता लाग खेत का सदमा।
दोउ परोसी लपटें झपटे हीठै लाग मुकदमा॥
सरसेवाद त कुछू न निकला करिन वकील लुटाई।
रिमझिम...........................
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आई शरद् रित
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गइल सूखि गै गलिहारन कै कांदौ कुछू टठांन।
नदिया नरबा ताल का पानी निकहा हबै थिरान॥
जमगै घाट घाट मां काई।
आई शरद.............
हरूहन धानै खरिहानन कै बन आई मेहमान।
बोई हड़हन बाली अरसी अकुरी औ हरिआन॥
खेतन मां लगी जोताई।
आई..........................
सुदिन साख के सुने संदेशा उनखे मन मां दुःख भा।
पिया मिलन के गइल मां गोई साम्हूं ठाढ है सुकवा॥
कब अइहैं पंडित नाई।
आई ..........................
कहैं परोसिन पिया से अपने अब न खेला ताश।
तोहरे आल्हा बांचत कढिगा य सगला चउमास॥
परा सगली ही ख्तवाई।
आई...............................
दओ पोलका भउजाई का हार हार से फट गा।
मेंहदी महाउर काजर टिकुली सेंदुर तक ता घट गा॥
अब ता कहु करा कमाई।
आई.............................
नीक लाग जब गया बिआहैं बांध झापि अस मउर।
मोरव करम फूटगे साजन तोहरे डेहरी ठउर॥
कइसां निबही अउर निभाई।
आई शरद रित आई॥
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तोर बिदुरखी देखी थे
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तुम हमार आंसू द्याखा, हम तोर बिदुरखी देखी थे।
हाथे मां रिमोट लये हम, आपन कुरकी देखी थे॥
तालेवर कै सांटीफिकिट, उंइ देथे छब्बिस रूपिया मां,
एतर गरीबी कै तउहीनी, फुरहिन फुर की देखी थे॥
नये थाल मां बासी रोटी, परसी गै सब दिन एतरै,
मुलुर मुलुर हम रजधानी कै, धमकी घुड़की देखी थे॥
देवी फिरै बिपत कै मारी, पंडा कहै मोही कला बताव,
गांव गांव मां करतूतै हम, भंइसासुर की देखी थे॥
कोउ नहि दूध का ध्वाबा राजनीत के धंधा मां,
सांझ सकारे चाह पियत हम,खबर कै सुरखी देखी थे॥
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आंगुर आंगुर
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आंगुर आंगुर नाप नाप के,जे पालिस लै कइंया।
महतारी औ बाप का मानै , दादू अंगा अंइया॥
बारूदन का पानी से , माचिस मां बड़ा भरोसा,
पता नही धौ कउन बात मां,को मिल जाय किरइया॥
बसुधैव कुटुम्बं केर भावना, देखा केतू सकिली,
अब आपन संसार कहाबै ,लड़िका सजनी सइंया॥
बड़े अपनपौ के विज्ञापन, अस रोज छलै,
ओहिन का जुग सांझ सकारे,रोज पराथै पइंया॥
भीतर से हें अनमन अनमन,औ गद्गद् बहिरे,
चीन्हे तक नही पावै बपुरे, को आपन अनगइंया॥
खूब तिपै सूरज ता देखा, हीठत हबै अकेले,
शीतल हिबै जोधइया ता रहतीं हैं साथ तरइया॥
महतारी के तेरही मां, लड़िकन मां रार ठनी,
केखर केतू लगा है खरचा,हीसा केर रूपइया॥
पीरा का अनुवाद करा थें,टप टप आंखिन अंसुआ,
आज के सरमन मात पिता कै कराथे दइया मइया॥
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रात रात भर
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रात रात भर किहन तरोगा हम जेखे अगुवानी मां।
बड़े सकारे मरे मिले उंइ एक चुल्लू भर पानी मां॥
कोउ नही सुनइया दादू चह जेतू नरिआत रहा,
सगला देस सुनिस अन्ना' का जब बोलिन रजधानी मां॥
नंच नंच आँखिन से झांकै बड्डे जबर सपन,
बोली बड़ी पिआर लगाथी तोतली बानी मां॥
शक के नजर से देखे जाथें जब साधू संन्नासी तक,
कइसा उनही रिस न चढी आतंकिन के मेहमानी मां॥
भला पेटागन रहि के कउनौ महाशक्ति का देस बनी,
जेखर जनता भूंखी नंगी टुटही छान्ही मां॥
खूब पैलगी होथी जेखर औ समाज मां मान हबै,
उनही सांझ के हम देखे हन गिरत भंजत रसदानी मां॥
जिअत अगाधैं मरे सराधैं हमरे हेन अनरीत हिबै,
सरमन' सब दिन मारे गे हें सत्ता के मनमानी मां॥
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पीर जानाथें
जेखे बहिनी बिटिया ही ओइन पीर जानाथें।
दरबार का बेउहार द्रोपदी के चीर जानाथें॥
तसलीमा नसरीन फिफिआत बागा थी,
हमरे सभ्भ समाज के वजीर जानाथें॥
कटाउतीं हैंकइसा नाक प्रगतिशील सुपनखा,
मरजाद के रखइया रघुवीर जानाथें॥
उंइ दुइ मुहा सिद्धांत जिअय केर आदी हें,
य पोल पट्टी कबीर जानाथें॥
वा काने मां काटा ठोक के बिदुरात चला गा,
य पीर अहिंसा के महावीर जानाथें॥
फलाने के मढइया तक पहुंचा नही अजोर,
लाल किला के कलश प्रचीर जानाथें॥
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करा खूस
उंइ कहिन आज हमसे घर मां,अब तुमहूं त कुछ करा खूस।
देखत्या है उनही तिपैं ज्याठ, तुम हया जड़ाने मांघ पूस॥
अरे कहूं रोप एकठे बिरबा, आपन फोटो खिंचवा लेत्या।
औ पर्यावरणी प्रेमिन मां, अपनौ नाव लिखवा लेत्या॥
पुन रेंजर से कइ सांठ गांठ, ठेका लइ लेत्या जंगल का।
जब अपनौ टाल खदान चलत,परसाद चढत हर मंगल का॥
गलिहारव हेरत रहै छांह, औ गोरूआ हेरैं घास फूस।
अब तुमहूं...........................
विद्युत मंडल बालेन से , तुमहूं हितुआरथ कइ लेत्या।
पुन चलत ठ्यसर मोटर चक्की,लुग्गी से स्वारथ कर लेत्या॥
कुछ लइनमैन का दइ दीन्या,त व बिजुली अस गोल रही।
औ अपनेव बिजली चोरी कै,दबी मुदी सब पोल रही॥
जब अधिकारी दउरा करिहैं,त वहै बनी आपन जसूस।
अब तुमहूं......................
बन जात्या कोटेदार तुहूंकइ जोर तुगुत कउनौ ओठरी।
करत्या पुन कालाबाजारी तुम उचित मूल्य के बोर्ड तरी॥
तेल चिनी औ चाउर से, जब चकाचक्क आनंद रहत।
औ सहबौ का थक्की भेजत्या, ता उनहूं का मुंह बंद रहत॥
सब बनगें कोटेदारी से, का तोंहरेन दारी परा उूंस।
अब तुमहूं.......................
तुमहूं ता तन से हया उजर, मन भले हबै सांमरपानी।
अपनेन ख्वांपा से शुरू करा, उतिना पहिले अपनै छान्ही॥
सरमन'कै भगती छ्वाड़ा, सह पइहा न कमरी का भार।
भाईन का हीसा हड़प हड़प, होइ चला चली पहिले निनार॥
जरजात लिखा ल्या नामे मां पटवारी का लै दै के घूंस।
अब तुमहूं त कुछ करा खूस॥
गीता कुरान औ बाइबिल का, चल कउनौ चाल लड़ा देत्या।
देस भक्त के पोथी मां तुम अपनौं नाव चढा लेत्या॥
भाईचारा का बिख दइके, दुध पिअउत्या दंगन का।
पर्दा का पल्ला छाड़ा, है नओ जमाना नंगन का॥
तुष्टीकरण के पुस्टी माही, कौमी एकता का जलुस।
अब तुमहूं.......................
तोहरव बिचार घिनहे सांकर, औ कपट नीत मां द्वहगर हा।
तुम राजनीत के नेतन कस, भितरघात मां प्वहगर हा॥
तुम दंदी भंदी फउरेबी, औ चुगुलखोर के सांचा हा।
मुंह देखी भांषन गीत पढै मा, तुम चमचन के चाचा हा॥
च्वार हया तुम कवियन अस, औ पत्रकार कस चापलूस।
अब तुमहूं त कुछ खूस॥
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भारत देश महान्
भारत देस महान भाई जानै सकल जहान।
इतिहासन कै सोन चिरइया होइगै लहूलुहान॥
कृषि परधान देस मां भाई मनई मरै बिन दाना।
जनता काहीं मिलै न कुटकी,नेता खांय मखाना॥
भारत माता के क्वारा मां नदिया बहै हजार।
मरै पिआसन हेन कै जनता सुखि गै बपुरी तार॥
राजनीत हेन गाय रही ही मेंघ मल्हार कै तान ।
भारत देस...........................................................
हथकरघा का वरगा देथी रेशम नगरी दिल्ली।
फटी फतोही तइन के फारै करै मजाक निठल्ली॥
गरीब गुजर करै कथरिन मां लगाये ठेगरी टांका।
कली दार कुरथा नेतन का पहिरे मलमल ढांका॥
भारत माता के देहें मा धोतिया वहै पुरान।
भारत देस..........................................................
कोठी माही रहै इंडिया निगडउरे मां भारत।
कउन कलम से लिखिहा भाई उन्नत केर इबारत॥
रपड़ा तरसै बूंद बूंद जिलहन मां बरखै बदरी।
भारत देस हमारै आय रह्य का नहि आय बखरी॥
फाइल माही बना ठाढ है हितग्राही का मकान।
भारत देस........................................................
अस्पताल का हाल क पूंछा वहै बेजार ही आज।
मुंह मांगी रकम डांक्टर ल्याहै होइ तबै इलाज॥
नही ता पुन वाखर मालिक है ईश्वर अल्ला ईसा।
वा गरीब कै अलहिन आ ही ज्याखर छूंछ है खीसा॥
चीर घर मां मांटी गंधाथी जमराज महकैं लै प्रान।
भारत देस.............
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विद्या के मंदिर मां बरती हैं लछमीं कै बाती।
कइसा देस य साक्षर होइ सरस्वतिव सकुचातीं॥
संस्कार कै हाट लगी ही पै ही मंहग बजार।
यहौ सदी मां एकलव्य के पढै कै नहि आय तार॥
ठाढे म्वाल चरित्र बिकाथै शिक्षा केर दुकान।
भारत देश.........................................................
थानन माही बोर्ड लगे हें देश भक्ति जन सेवा''।
होन अबला की बड़मंसी लुटतीं निरदोषन के क्यावा॥
झूंठ मूंठ का गढै मुकदमा करैं बहस कै चोट।
जे हत्या कइ दे सत्य कै निकहा करिया कोट॥
जांघन जांघन लोकल गुंडा बागैं सीना तान।
भारत देस.............................
राम अउर रहिमान हें बंदी धरम चढा फाँसी मां।
कबौ अजोध्या मथुरा मां कहूं खूंन बहै काशी मां॥
धरम के नाम मां चंदा लइके भइ लइन आपन खीसा।
बकुला भगत पिअरिया ओढे़ पढै़ हनुमान चलीसा॥
लूट लइन देवी देउतन का उनहिन के जजमान।
भारत देश..........................................................
राष्ट् भांषा हेन बनी तमासा पाय रही ही त्रास।
रामायन की होरी बरतीं सिसकैं तुलसी दास॥
गांॅधी जी के लउलितियन कै देस मां चिंदी चिंदी होइगै।
बिना बिआही महतारी अस भांषा रानी हिन्दी होइगै॥
अजुअव तक ता बनैं न बोलत बउरा हिन्दुस्तान।
भारत देस महान्............................................
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गुरूबाबा
गुरूबाबा हें दिया ग्यान कै, औ विज्ञान त्रिवेनी आंय।
गोबिन्द तक पहुंचामै बाले, गुरूअय सहज नसेनी॥
गुरू ज्ञान के परम खजाना, औ गुरू करूणा के निधान हें।
ईं विद्या के बगिया मांही, भारत देस के महाप्रान हें॥
ज्ञान देंय मां नही भेद, को हिन्दू मुसलिम जैनी आय।
गुरूबाबा हें.............................
माता दीन्हिस सुंदर काया गुरू शिक्षा के संस्कार।
सभ्भ बनामै कांही गुरू जी, कीन्हिन शब्दन से सिंगार॥
भारत माही गुरू कै पदवी, गीता शबद रमैनी आय।
गुरूबाबा हें...................
गुरू शब्द कै शक्ति देथें, गुरूअय भाग्य विधाता।
निरच्छर का ब्रम्हाक्षर से, जोड़ जोड़ के नाता॥
गुरू अजोध्या के बशिष्ट, औ संदीपनी उज्जैनी आंय॥
गोबिन्द तक पहुंचामै बालेगुरूअय सहज नसेनी आंय॥
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उूपरबाला
गिनै रोज हर सांस फलाने,बही मां लेय उतार।
बड़ा हिसाबी है य उूपर बाला साहूकार ॥
कुछ दिन आबा संचता बहुरा दइ उराव का घाव।
बपुरा दुखिया दुक्ख के नेरे बइठ करै उपचार॥
जेतू सांसै लइके आयन ओतुन कमी परी।
अधिक ब्याज के लालच मां लइ आयन अउर उधार॥
चाहे जउन गइल से हींठा सब मरघट तक जातीं है।
धौं कउन गली मां हबै फलाने सरग नरक का दुआर॥
चंदा के मंदिर मां बइठे हें आसरिक पुजारी के।
दुनिया ठाढ ही जेखे आंगू दोउ हांथ पसार ॥
बड़ा हिसाबी है य उपर बाला साहूकार॥
चाहे जेखे भाग मां भइलो जउन जउन लिख देय।
धौं को दइस बिधाता काहीं य सगले अधिकार॥
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आजादी कै स्वर्ण जयंती
आजादी कै स्वर्ण जयंती टी बी मां अकबारन मां।
आजादी कै स्वर्ण जयंती दुपहर के अंघिआरन मां॥
हमरे देस मां स्वर्ण जयंती सुरसा अस मंहगाई कै।
वन्हा अस जे दल का बदलै वा दलबदलू भाईकै॥
आजादी कै स्वर्ण जयंती भै दिल्ली भोपाल मां ।
आजौ हरिया है गुलाम हेन गांॅवन के चउपाल मां॥
आजादी कै स्वर्ण जयंती पूंजी बाद कछारन मां।
आजादी कै स्वर्ण जयंती भै अलगू के बखरी मां।
सरकारी योजना बंधी हैं जेखे खूंटा सकरी मां॥
चमचागीरी अभिनंदन के गाये ठुमरी ददरी मां।
झूर झार जे खासा गरजै उजर उजर वा बदरी मां॥
लमही बाली मउसी रोबै पंच के अत्याचारन मां।
स्वर्ण जयंती बापू के भुंइ मां भै नाथू राम कै।
स्वर्ण जयंती जयललिता के साथ साथ सुखराम कै॥
स्वर्ण जयंती वोट के खातिर तुस्टी करण मुकाम कै॥
स्वर्ण जयंती रथ यात्रा औ नारा जै श्री राम कै॥
गांॅधी बाद समाज बाद लग बाये लबरी नारन मां।
आजादी कै स्वर्ण जयंती हमरे देस के कांव मां।
केसर मां कस्तूरी मांही कश्मीरी के घाव मां॥
महतारी जह अरथी ढोबै छाती पीटत गांव मां।
दिल्ली बइठ तमासा देखै श्री नगर बाव मां॥
स्वर्ण जयंती हिबै अमल्लक घाती के गद्दारन मां।
आजादी कै स्वर्ण जयंती कानूनी व्यापारिन कै।
चोर उचक्का डांकू लुच्चा गुंडा अत्याचारिन कै॥
आजादी कै स्वर्ण जयंती करफू गोली गारिन कै।
जे बिश्वकर्मा का पिअंय पसीना खूनी पूंजीधारिन कै॥
जे मजूर के खून से पउधा पालै गमला जारन मां।
आजौ हमरे देस के सैनिक पाकिस्तानी जेल मां।
लगथै दिल्ली भूल गै उनही छुआछुअल्ला खेल मां॥
हमरे हांथे कुछू न आबा वा शिमला के मेल मां।
औ उंइ आपन सउंज उतारथें सरदार पटेल मां॥
हमी गर्व है महावीर अब्दुल हमीद बलिदानिन मां।
जिधना हम गद्दारन कांही धरती मां गड़बा द्याबै।
जिधना मानसरोबर माही हम तिरंगा फहरा द्याबै॥
बोली हर हर महादेव कै बोलब रावल पिण्डी तक।
उधनै होई स्वर्ण जयंती संसद से पगडंडी तक॥
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा नीक लगी तब नारान मां।
आजादी कै स्वर्ण जयंती टीबी मां अखवारन मां॥
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भइलो चलें करामय जांच
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जब उंइ खाइन मिला न आरव। हर गंगे।
हमरे दारी झारव झारव ॥ हर गंगे।
कूटत रहें रोज उंइ लाटा। हर गंगे।
हमरे दारी लागैं डांटा ॥ हर गंगे।
पांच साल खुब किहिन तरक्की।हर गंगे।
बोर ठ्यसर औ लगिगै चक्की॥हर गंगे।
दिहिन न हमही ध्याला झंझी।हर गंगे।
अब हिसाब कै मांगै पंजी॥हर गंगे।
अब य ओसरी आय हमार।हर गंगे।
अब तुम सेंतै करत्या झार॥हर गंगे।
भयन संच मां जब हम पांच।हर गंगे।
भइलो चलें करामय जांच॥हर गंगे।
जादा तुम न करा कनून।हर गंगे।
चुहकैं द्या जनता का खूंन॥हर गंगे।
मुलुर मुलुर द्याखा चउआन।हर गंगे।
हम कूदी तुम ल्या बइठान॥हर गंगे।
होइगे भइलो छांछठ साल।हर गंगे।
हमूं बनाउब ढर्रा ताल॥हर गंगे।
जब आंगना मां होइगै नाच।हर गंगे।
त भइलो चलें करमय जांच॥हर गंगे।
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आजादी से अजुअव तक वइसै फटी ही कथरी।
भारत देस हमारै आय रहय का नहि आय बखरी। ।
देखा एक नजर जनतै पुन देखा आपन ठाठ।
दस दस मोटर तोहरे दुअरा हमरे टुटही खाट। ।
कब तक हम अपना का ढोई लहकै लाग है कन्धा।
तुहिन बताबा राजनीत अब सेवा आय कि धन्धा। ।
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नल तरंग 'बजाउथें
'नल तरंग 'बजाउथें बजबइया झांझ के।
देस भक्ति चढ़ा थी फलाने का साँझ के। ।
''वीर पदमधर ''का य पीढ़ी नही जानै
ओखे बस्ता म हें किस्सा हीर राँझ के।।
पूंछी अपना बपुरी से कि कइसा जी रही
जेही कोऊ गारी दइस होय बाँझ के। ।
उनही ईमानदार कै उपाधि दीन गै
जे आँधर बैल बेंच दइन काजर आंज के। ।
हंस य कवित्त भर से काम न चली
चरित्त का चमकाबा पहिले माँज माँज के। ।
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आबा हो लछमी
आबा हो लछमी आबा साथै गनेश के।
स्वागत म देस ठाढ़ है दियना लेस के। ।
मुड़हर से ओसारी तक बड़की सजाये घर का।
स्वस्तिक औ रंगोली से गोदना गोदये फरका। ।
डेहरी सुदिन निकारे तोहरे गृह प्रवेश के।
आबा हो -लछमी ------------
दुअरा म बँधनबार औ शुभ लाभ भीत म।
गोबर से महकै माटी जस लोक गीत म। ।
अगमानू म अजोर थिरकेँ भेष भेष के।
आबा हो लछमी ------------
जब से 'भृगु जी 'मारिन श्री हरि का लातें।
तब से दलिद्रता कै अंधियारी कारी रातें। ।
भारत कै सगली माया लई गें विदेश के।
आबा हो लछमी आबा ----------
गाँवव म अहिरा बाबा का भारी हूंन ही।
होती हैं गऊ कै हत्या सब सार सून ही। ।
मुरइला का छाहुर रोय गा बिन गाय भैस के।
आबा हो लछ्मी आबा साथै गनेस के। ।
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हिन्दी
वीर कै गाँथा लगी जो रचैं औ 'जगनिक 'के आल्हा का गायगै हिन्दी।
कब्बौ बनी 'भूखन 'कै बानी त वीरन का पानी चढ़ाय गै हिन्दी। ।
हाथे परी 'सतसय्या 'के ता वा 'सागर मा गागर 'भराय गै हिन्दी।
बुढ़की लगाइस 'सूर 'के सागर ता ममता मया मा नहाय गै हिन्दी। ।
'रसखान 'के क्वामर क्वामर छन्द औ मीरा के पद काही ढार गै हिन्दी।
भक्ति के रंग मा लागी रंगै तब भाषा लोलार पिआर भै हिन्दी। ।
बीजक साखी कबीर के व्यंग्य पाखण्डिन का फटकार गै हिन्दी।
औ मासियानी मा तुलसी के आई ता 'मानस 'अगम दहार भै हिन्दी। ।
हिंठै लगी जब 'पंत 'के गाँव ता केत्ती लगै सुकुमार य हिन्दी।
हरिचंद ,महावीर ,हजारी ,के त्याग से पुष्ट बनी दिढ़वार य हिन्दी। ।
निराला ,नागार्जुन ,के लेखनी मा भै पीरा कै भ्याटकमार य हिन्दी।
रात जगी जब ''मुंशी ''के साथ ता हरिया का भै भिनसार य हिन्दी। ।
भारत माता के कण्ठ कै कण्ठी औ देस कै भाषा लोलार हिन्दी।
लोक कै बोली औ भाषा सकेल के लागै विंध्य पहार य हिन्दी। ।
छंद ,निबंध ,कहानी,औ कविता से लागै सुआसिन नार य हिन्दी।
अपने नबऊ रस औ गण शक्ति से कीन्हिस सोरहव सिगार य हिन्दी। ।
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पावस कै रित आई
रिम झिम रिम झिम मेघा बरखै , थिरकि रही पुरवाई।
धरती ओडिस हरियर चुनरी पावस कै रित आई। ।
भरे दबादब ताल तलैया कहूँ चढ़ी ही बाढ़।
एकव वात न लेय किसनमा जब से लगा असाढ़। ।
बोबै बिदाहै रोंपै नीदै करै नीक खेतवाई। ।
भउजी बइठे कजरी गौती भाई आल्हा बाँचै।
टिहुनी भर ब्वदा मा गाँवन की चौपालै नाचैं। ।
करै पपीहा गोइड़हरे मा स्वाती केर तकाई। ।
रिम झिम रिम झिम मेघा बरखै थिरकि रही पुरवाई। ।
गऊ चरनी सब जोतर गईं ही रखड़उनी मा बखरी।
धधी सार मा गइया रोमै खूब बमाती बपुरी। ।
''मैया धेनु चरामै जइहव ''मचले किशन कन्हाई।
रिम झिम रिम झिम मेघा बरखै थिरकि रही पुरवाई। ।
चउगानन का अतिक्रमन लील गा लगी गली मा बारी।
मुड़हर तक जब पानी भरिगा रोमै लाग ओसारी। ।
हंस कहिन की खूब फली सरपंचन केर मिताई।
रिम झिम रिम झिम मेघा बरखै थिरकि रही पुरवाई। ।
चुअय लाग छत स्कूलन कै दइव बजाबै ढोल।
एक दउगरै मा लागत कै खुल गै सगली पोल। ।
विदया के मंदिर मा टोरबा भींजत करैं पढ़ाई।
रिम झिम रिम झिम मेघा बरखै थिरकि रही पुरवाई। ।
जब उई पउलै लगें मेंड़ त ख्यात का लगिगा सदमा।
दोउ परोसी लपटें झपटें हिंठै लाग मुकदमा। ।
सर सेवाद ता कुछू न निकला करिन वकील लुटाई।
रिम झिम रिम झिम मेघा बरखै थिरकि रही पुरवाई।
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आजादी कै स्वर्ण जयंती
आजादी कै स्वर्ण जयंती टीबी मा अकबारन मा।
आजादी कै स्वर्ण जयंती दुपहर के अधिआरन मा।।
हमरे देस मा स्वर्ण जयंती सुरसा अस महंगाई कै।
वढना अस जे दल का बदलै वा दल बदलू भाई कै।।
आजादी कै स्वर्ण जयंती ही दिल्ली भोपाल मा।
आजौ हरिआ है गुलाम हेन गांवन के चउपाल मा।।
आजादी कै स्वर्ण जयंती पूंजीवाद कछारन मा।
आजादी कै स्वर्ण जयंती टीबी मा अकबारन मा।।
आजादी कै स्वर्ण जयंती ही अलगू के बखरी मा।
सरकारी योजना बधी है जेखे खूंटा सकरी मा।।
चमचागीरी अभिनंदन के गाये ठुमरी ददरी मा।
झूरझार जे खासा गरजै उजर उजर वा बदरी मा।
लमही बाली मउसी रोबै पंच के अत्याचारन मा।
आजादी कै स्वर्ण जयंती टीबी मा अकबारन मा।।
स्वर्ण जयंती बापू के भुंइ मा ही नाथूराम कै।
स्वर्ण जयंती जयललिता के साथ साथ सुखराम कै।।
स्वर्ण जयंती बोट के खातिर तुष्टीकरण मुकाम कै।।
स्वर्ण जयंती सिद्धांतन के कुर्सी निता लिलाम कै।।
गांधीवाद समाज वाद लगबाये लबरी नारन मा।
आजादी कै स्वर्ण जयंती टीबी मा अकबारन मा।।
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गोस्वामी तुलसी दास
हे तुलसी हुलसी नंदन पूज्यपाद श्री संत।
हे भारतीय संस्कृति के रक्षक चिरनवीन अनंत। ।
धन्य धरा वह राजा पर की बहती जहां कालिंदी।
धन्य प्रेरणा रत्नावलि की महिमा मंडित हिंदी। ।
धन्य कलम जिसने दिये मानस से सद्ग्रन्थ।
जो सदाचार मर्यादा का बतलाते नित पंथ। ।
जिसके पठन से आत्म शांति होती अनुभूति तुरंत।
हे तुलसी हुलसी नंदन पूज्यपाद श्री संत।।
शैव शाक्त औ वैष्णव जन को एक सूत्र में बांधा।
मुक्तक से मानव मुक्ति की दूर करी है बाधा। ।
लौकिक सगुणोपासक बन कर अलौकिक दिया प्रकाश।
शत शत बंदन अभिनन्दन गोस्वामी तुलसी दास। ।
सहज समन्वय कारी पंथ केरहे जीवन पर्यन्त।
हे तुलसी हुलसी नंदन पूज्यपाद श्री संत।।
गंगोत्री के पावन जल से जलाभिषेक कर रमेश्वरम् का।
ईश भक्ति में राष्ट्र भक्ति का देश प्रेम भारतीय धरम का। ।
रामचरित मानस के जैसा कर्तव्य बोध शोध उत्कर्ष।
विश्व के किसी ग्रन्थ में ढूढे मिलेगा यह न पुनीत आदर्श। ।
सात समंदर पार भी शाश्वत सनातन है अटल वंत।
हे तुलसी हुलसी नंदन पूज्यपाद श्री संत।।
हे भाषा के अमर भाष्कर किया राष्ट्र भाषा उत्थान।
स्वयं विनायकऔ माँ वाणी गाते जिसका यशो गान। ।
चित्रकूट की तपो भूमि के हे तपस्वी संत महान।
महा प्रलय तक ऋणी रहेंगे हिन्दू हिंदी हिन्दुस्थान। ।
जनम महोत्स्व मना रहा है आज भारतीयता का संत।
हे तुलसी हुलसी नंदन पूज्यपाद श्री संत।।